Sep 12, 2016 · 1 min read

घाव

उघङ जाते हैं कुछ घाव मरहम लगाने के फेर में
धीरे से किसी कोने से रिस जाया करते हैं
छोड़ जाते हैं फीकी सी हँसी होठों पर
अश्क आखों में भर जाया करते हैं
छीलकर निर्मम हाथों से गालों को
फिर आँचल में सिमट जाया करते हैं
पूछे गर कोई वजह बहने की
तो अश्क भी मुस्कुराया करते हैं
रचकर इक नयी कहानी
घाव खुद से ही छिपाया करते हैं
छिपा कर खुद ही बदसूरती अपनी
आइने से खुद ही शरमाया करते हैं
जानते हैं भ्रम में जी रहे हैं
पर हकीकत से मुंह छिपाया करते हैं
हाँ कुछ घाव भी मुस्कुराया करते हैं खिलखिलाया करते हैं

नूतन

2 Comments · 147 Views
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