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Jun 11, 2022 · 3 min read

गज़लें

चंद गज़लें
1.
शायरों की महबूबा है गज़ल
आशिकों की दिलरुबा है गज़ल ।
अब क्या कहें कि क्या है गज़ल
बेजुबां शायरी की सदा है गज़ल ।
मीर,मोमिन,दाग,गालिब ही नहीं
कैफ़ि,दुष्यंत की दुआ है गज़ल ।
हुस्न की तारीफ,इश्क़ की नेमत
रकीबों के लिए बददुआ है गज़ल ।
बेबसों की बुलंद आवाज़ ही नहीं
इन्क़लाब की भी अदा है गज़ल ।
उर्दू की शान,अदब के लिए जान
मुशायरों के लिए शमा है गज़ल ।
हर दौर में निखर रही मुस्ल्सल
हर दौर की सच्ची सदा है गज़ल ।
औकात नहीं अजय तेरी, तू कहे
तेरे लिए तो इक बला है गज़ल ।
-अजय प्रसाद

2.

खुद से ही आज खुद लड़ रहा आदमी

अपनी ही जात से डर रहा आदमी

दौड़ते भागते सोते औ जागते

सपनो के ढेर पर सड़ रहा आदमी ।

इस कदर मतलबी बन गया आज वो

खुद के ही नज़रो में गड़ रहा आदमी ।

रात दिन छ्ल रहा अपने ही आपको

अपनो के पीछे ही पड़ रहा आदमी ।

अब अजय इस जमाने की क्या बात हो

आदमी से जहाँ जल रहा आदमी

-अजय प्रसाद
आशिक़ी मेरी सबसे जुदा रही

ज़िंदगी भर वो मुझसे खफ़ा रही ।

देखता मैं रहा प्यार से उन्हे

बेरुखी उनकी मुझ पर फिदा रही ।

ये अलग बात है उनके हम नहीं

वो हमेशा मगर दिलरुबा रही ।

रात भी, ख्व़ाब भी ,नींद भी मेरी

फ़िक्र तो उनके बश में सदा रही ।

जोड़ना दिल मेरी कोशिशों में थी

तोड़ना दिल तो उनकी अदा रही ।

वक्त के साथ वो भी बदल गए

वास्ते दिल में जिनके वफ़ा रही ।

क्या करें अब, अजय तू ज़रा बता

मेरी किस्मत ही मुझसे खफ़ा रही ।

-अजय प्रसाद

कत्ल कर के मेरा, कातिल रो पड़ा

कर सका कुछ जब न हासिल,रो पड़ा ।

खुश समन्दर था मुझे भी डूबो कर

अपनी लाचारी पे साहिल रो पड़ा ।

आया तो था वो दिखाने धूर्तता

सादगी पे मेरी कामिल रो पड़ा।

जो बने फिरते हैं खुद में औलिया

हरकतों पर उन की जाहिल रो पड़ा ।

की मदद मज़दूर ने मजदूर की

अपनी खुदगर्जी पे काबिल रो पड़ा ।

जा रही थी अर्थी मेरे प्यार की

हो के मैयत में मैं शामिल, रो पड़ा ।

बिक गया फ़िर न्याय पैसों के लिए

बेबसी पे अपनी आदिल रो पड़ा

-अजय प्रसाद

जाने वो लम्हा कब आएगा

जब कुआँ प्यासे तक जाएगा ।

झाँकना अपने अन्दर भी तू

खोखला खुद को ही पाएगा ।

कब्र को है यकीं जाने क्यों

लाश खुद ही चला आएगा ।

थूका जो आसमा पे कभी

तेरे चेह्रे पे ही आएगा ।

इश्क़ में लाख कर ले वफ़ा

बेवफ़ा फ़िर भी कह लाएगा ।

वक्त के साथ ही ज़ख्म भी

देखना तेरा भर जाएगा

रख अजय तू खुदा से उम्मीद

वो रहम तुझ पे भी खाएगा ।

-अजय प्रसाद

चार दिन चांदनी फिर वही रात है

आजकल इश्क़ में ऐसा ही हाल है ।

पानी के बुलबुले जैसी है आशिकी

अब न मजनू है कोई ,न फरहाद है ।

हुस्न में भी वो तासीर अब है कहाँ

वो न लैला न शीरी की हमजाद है ।

जिस्मों में सिमट कर वफ़ा रह गयी

खोखलेपन से लबरेज़ ज़ज्बात है ।

माशुका में न वो नाज़ुकी ही रही

आशिकों में कहाँ यार वो बात है

इश्क़ में इस कदर है चलन आजकल

रोज जैसे बदलते वो पोशाक है

मतलबी इश्क़ है मतलबी आशिकी

प्यार तो अब अजय सिर्फ़ उपहास है ।

-अजय प्रसाद

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