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ग्रामीण चेतना के महाकवि रामइकबाल सिंह ‘राकेश

जन्म 14 जुलाई 1912
निधन 27 नवम्बर 1994
उपनाम —- राकेश
जन्म स्थान ‘भदई’ ग्राम,
ज़िला मुजफ्फरपुर, बिहार

किछ प्रमुख कृति

मैथिली लोकगीत,भारतीय लोकगाथा’ (अप्रकाशित),मैथिली लोकगाथा,
चट्टान,गाण्डीव,मेघदुन्दुभि,गंधज्वार,पद्मरागा ,

अवसानोन्मुख छायावाद के साहित्यकोशमें मानवतावाद एवं ग्राम चेतना के महाकवि रामइकबाल सिंह ‘राकेश’ के उदय सँ हिन्दी कविता आओर मैथिली के प्रति एक नया दृष्टिकोण आबि गेल। हिन्दी आओर मैथिली साहित्य मे हुनक उपस्थिति ओहि समय दर्ज भेल छल जखन छायावाद ढलान पर छल, हिन्दी कविता व्यक्तिगतता आ प्रकृतिक आवरण हटा कए जनसरोकार मे शामिल हेबाक लेल बेचैन छल। प्रगतिशील मार्तण्डक लालिमा छायादार क्षितिज पर दस्तक के तैयारी क रहल छल । सत्तरि बरखक प्रयोगक बाद मरि रहल मार्क्सवादी विचारधारा कविताक सहायतासँ पुनः उठबाक प्रबल प्रयास कऽ रहल छल। श्रमिक,वंचित,शोषित आदिक गप्प करैत पूँजीवादक आत्मा मे प्रवेश करबाक बहाना ताकि रहल छल। एहि सभ परिस्थितिमे रामइकबाल सिंह ‘राकेश’ एहि कविताकेँ विचारधाराक दलदलसँ बचा कऽ मानववादक स्वस्थ भूमिपर स्थापित कएलन्हि।

ललित बिम्ब योजना के महान कवि, सुसंगठित इन्द्रिय विन्यास, ग्रामीण चेतना आ मानवतावाद का जन्म हिमालयक गोदीमे स्थित मुजफ्फरपुर जिलाक भदई गाँममे 14 जुलाई, 1912 कए भेल। ई गाम कलामक महान गद्यकार रामवृक्ष बेनीपुरीक साहित्यिक आ सांस्कृतिक गतिविधिक केन्द्र सेहो रहल अछि। साहित्यिक यात्रा आ किछु पत्रिकाक सेवाकाल छोड़ि, तखन महाकवि राकेशक समस्त साहित्यिक अभ्यास एहि गामक एकटा झोपड़ी मे चलैत रहल, जाहि पर 27 नवम्बर 1994 क आधा राति मे नियति पूर्ण रूप सँ रोकि देलक। आधा राति मे सुगंध पसारय बला दू टा विशाल मौलश्री-गाछक बीच बनल ई झोपड़ी आइयो हुनक सूक्ष्म उपस्थितिक आभास दैत अछि, जे हुनक विशाल साहित्यिक अभ्यासक स्मारक थिक।

ओहि जमाना मे जखन कविता छायावादी व्यक्तिगतता आ प्रकृतिक पर्दा हटा कए जनसरोकार मे शामिल हेबाक लेल बेचैन छल तखन दोसर दिस प्रगतिशील मार्तंडक लालिमा सेहो छायावादी गोधूलि के छाया तोड़ि बहुजनक रागक जप करबाक तैयारी मे छल . एहि परिस्थिति मे छायावादी-प्रगतिशील अतिवाद केँ छोड़ि महाकवि राकेश सर्वजन हिताय सर्वजन सुखायक पगडंडी सँ गुजरैत एहि-

पिघलब जँ अन्तर हमर अछि, अनजान मे आन्दोलित।
जगत के मरुभूमि में जब गंगा यमुना बही |

एहि सभ परिस्थितिमे प्रगतिवादक एकतरफा दृष्टिकेँ छोड़ि महाकवि ‘राकेश’ मानवतावादी भावना आ चिन्ताक आधारपर हिन्दी कविताक स्थापना कयलनि। हिन्दी कविता जगत मे ई एकटा युग-निर्माणक घटना अछि, जकरा हिन्दीक आलोचक लोकनि द्वारा घोर उपेक्षा कयल गेल अछि। यद्यपि कथासम्राट प्रेमचंद जीक जीनगी-दृष्टिकोणक प्रति बहुत आदर छलनि, ताहि कारणेँ ओ मानवतावादक एहि पुरुषकेँ सदिखन ‘हंस’मे प्रकाशित करैत छलाह। एकर संग-संग हिनक कविता सभ विशाल भारत आदि मे छपब शुरू भेल, फेर सहजहि नामी-प्रख्यात साहित्यकार आ समीक्षक जेना हजारी प्रसाद द्विवेदी, सुमित्रानंदन पंत, बनारसी दास चतुर्वेदी, पंडित अमरनाथ झा, पंडित रामदहिन मिश्र, ‘निराला’, प्रेमचंद आदि आकर्षित भेलाह आ हुनक कविता सभ विमर्शक केन्द्रमे आबि गेल !

खासकय हिनका लोकनिक निर्माण आ हिनका लोकनिक पहिचान मे ‘हंस’ केर भूमिका सब सँ बेसी महत्वपूर्ण रहल। इहिके बाद राम इकबाल सिंह पर हिन्दी के मुक्त आलोचक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रो. चन्द्रबली सिंह सेहो कवितामे निहित मानवतावादी क्रोध आ प्रगतिशीलताक अग्नि केँ चिन्हलनि। मनुष्यक शक्ति आ ओकर विजय पर हुनका गहींर विश्वास छलनि। अपन जीवन दर्शनमे मानववाद के सर्वोच्च स्थान पर स्थापित केलनि। हुनक दृष्टिमे मानववाद सँ कोनो विचारधारा श्रेष्ठ नहि अछि, कारण ई सागर थिक जतय सब विचारधाराक नदी आबि क’ विलय भ’ जाइत अछि | हुनकर मानब छनि जे संसारक सभ विचारधारा मे मनुष्यक स्थान कतहु नहि अछि।

हे कार्ल मार्क्स के वरदपुत्र, हे कोतल के अरबी घोड़े,

नाहक मारे-मारे फिरते, क्यूँ स्टालिन के खाकर कोड़े।

श्लोकत्व शोक को दे न सकेगा मतवादों का विज्ञापन,

मार्क्सिज्म गलत, फासिज्म गलत, सभी इज्म चिथड़े समान।

है सिर रखने को भी न कहीं मानवपुत्रों के लिए स्थान ।।

महाकवि राम इकबाल सिंह ‘राकेश’ जीक पहिल कविता संग्रह ‘चट्टान’ (1946) छै जिनकर भूमिका मे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखैत छथि – “इतिहास आ राजनीति बेर-बेर मोन पाड़ैत छै जे मनुक्ख कतेक बेर पराजित होइत छै , थकैत छै , रुकि जाइत छै आ लोकगीत कहैत छै आ हम एक दुर्जेय मानव के विजय यात्रा के संवाद सुनाबैत छै | ‘राकेश’ जीक कविता मे प्रमाण भेटैत अछि जे मनुष्यक एहि रूप सँ हिनका पर बहुत प्रभाव पड़ल अछि।” एकर अतिरिक्त ‘गांडीव(1949), मेघदुन्दुभि(1979), गंधज्वार
(1990)’ काव्य रचना सभ हुनक मानवतावादी दृष्टिकोणक संग-संग हुनक दार्शनिक आ क्रान्तिकारी विचार सेहो प्रस्तुत करैत अछि। उत्तर छायावादक कवि हेबाक कारणेँ छायावादी प्रभाव हिनका पर सेहो देखल जा सकैत अछि-

तुलसी मंजरी के माला लदल
प्राण कोश मे ऊपर-नीचाँ भरैत अछि।

‘ईश्वर’ आ ओरछा के जंगलमे ‘गांडीव कऽ दूटा कविता मुक्तिबोध आ भवानीप्रसाद मिश्रक दूटा कविताक पूर्वाभास दैत अछि – ‘एक शून्य दिस’ आ ‘सतपुराक सघन वन’। सामग्री आ शैलीक समानता एहि दुनू कवितामे देखल जा सकैत अछि। राकेश जी के ओरछा के जंगल में घुमबाक अवसर भेटल जखन ओ कुण्डेश्वरमें पं. बनारसीदास चतुर्वेदी के पाहुन बनल छलाह।काव्य-व्यक्तित्व सँ प्रभावित भ’ एक बेर प्रभाकर मचवे ‘कल्पना’ नामक पत्रिका केँ साक्षात्कार देलनि जे – “जँ हम ‘तरासप्तक’क सम्पादक रहितहुँ तँ एकर एकटा कवि रामइकबाल सिंह राकेश रहता ।” राकेश जी अपन कल्पना आ शैलीमे तारसप्तकक कोनो कविसँ कम नहि छलाह। ‘बेतवा के किनारे’ कविताक एहि पाँति सभसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि –

सुन रहा हूँ बेतवा के गगनभेदी घोष,

जैसे बज रहा रण-ढोल अथवा वेग से उठकर बवंडर
घहर हर हर फूँकता जाता समुद्री शंख पूरे जोर से ।

जनमल लौंग दुपत भेल सजनि गे
फर फूल लुबधल जाय
साजी भरि-भरि लोढ़ल सजनि गे
सेजहीं दे छिरिआय
फुलुक गमक पहुँ जागल सजनि गे
छाड़ि चलल परदेश
बारह बरिस पर आयल सजनि गे
ककवा लय सन्देश
ताहीं सें लट झारल सजनि गे
रचि-रचि कयल शृंगार

कविताक अतिरिक्त गद्य साहित्यक भाषा आ शैली सेहो महाकवि ‘राकेश’ सँ अतुलनीय अछि। जेना ‘स्मृतियों के रंगचित्र(1979), ‘मैथिली लोकगीत’ (1942), ‘भारतीय लोकगाथा’ (अप्रकाशित)। मैथिली लोकगाथा लुप्त होइत ग्रामीण संस्कृतिक संग्रहालय अछि। भूमिकामे भारतक गौरव पं. अमरनाथ झा लिखैत छथि जे – ‘समय एतेक परिवर्तनशील होइत अछि, रुचि एतेक जल्दी बदलैत रहैत अछि जे किछुए दिन मे ग्रामीण साहित्य के एकटा टीकाक अपेक्षा करैत अछि। पं. अमरनाथ झा, सुमित्रानन्दन पंत, पं. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, पं. बनारसीदास चतुर्वेदी, महापंडित राहुल सांकृत्यायन सहित समस्त प्रख्यात साहित्यकार-समीक्षक सँ सम्बन्धित संस्मरण अछि। संगे-संग भारतीय ‘लोकगाथा’ मे भारतक विभिन्न संस्कृतिक संदर्भ सेहो भेटैत अछि। एहि मैथिल पुत्र महाकवि के हुनक 107 म जयंतीक अवसर पर नमन ।

डॉ सुधांशु कुमार
भदई,मुजफ्फरपुर

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