Sep 30, 2016 · 1 min read

ग़ज़ल

बस तेरे चाँद की,एक झलक़ चाहिये..!!
***ग़ज़ल***

मुझको तेरी जमीं,
न फलक़ चाहिये..!
बस तेरे चाँद की,एक झलक़ चाहिये..!!

है अमानत तेरी,
मानता हूँ मगर,
उस पे मेरा भी तो,होना हक़ चाहिये..!!

उसको बापर्दा बदली
में रखिये मगर,
मेरे दिल की समझनी,कसक़ चाहिये..!!

थोड़ी उसको मोहब्बत,
सिखा दीजिए,
उसमें चाहत की होनी,ललक चाहिये..!!

आपने उसको दी
हुस्न की चाँदनी,
उसमें कुदरत के जैसी,लचक चाहिये..!!

हम तो “वीरान” हैं,
फिर भी ख्वाहिश मेरी,
उसमें फूलों सी हमको,महक चाहिये..!!
कॉपीराइट@यशवन्त”वीरान”

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