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May 13, 2022 · 1 min read

ग़ज़ल

माँ मेरी जब उदास होती है
वो मेरे दिल के पास होती है

भूख को अपने बाँटती सबसे
खा लो कहती है ख़ास होती है

रात भर नीद से वो लड़ती है
जगा सबको निराश होती है

गुनगुना कर के देखना पीछे
अपने दिन की तलाश होती है

अपने बेटों की सोचती है ‘महज़’
खुशी की जब भी आस होती है

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