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Apr 17, 2022 · 1 min read

ग़ज़ल

आज ग़ज़ल से बात हुई अनजाने में ।
गाने लगा हूँ उसको मैं अफसाने में ।

अपने ग़म की ओढ़ काफिया रहती है।
और रदीफ़ लगा है खुशी निभाने में ।

रोग सियासत का पाला है यूँ उसने ।
सबको ठाना है वो आज गिराने में ।

चोट करे ज़ज़्बातों पे वो महफ़िल में ।
जब मुसकाये देख मुझे वो गाने में ।

भूख बढ़ाती हैं बातें अक्सर उसकी ।
महज़ गरीबी ज़ुबां से लगा मिटाने में I

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