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गर्मी का रेखा-गणित / (समकालीन नवगीत)

खींचती है
उष्ण-चतुर्भुज,
गर्मी अपने
बिन्दु-बिन्दु से ।।

खींचती है
वक्र रेखाएँ लपट कीं
पसीने के
कोण पर यह ।
बनाती है
वृत्त लू के बाह्य,भीतर
गली,घर
औ’ मोड़ पर यह।।

फूँकती
पावक बराबर
मेघ,नभ,रवि
और इन्दु से ।।

काटती हैं
वक्र किरणें,समानांतर
धैर्य की
रेखाओं को भी ।
तोड़ती है
लू परिधि को
व्यास को,
त्रिज्याओं को भी ।।

आ रही हैं
उष्ण पवनें
झील,सरिता
और सिंधु से ।

खींचती है
उष्ण-चतुर्भुज
गर्मी अपने
बिन्दु-बिन्दु से ।

000
—– ईश्वर दयाल गोस्वामी ।

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