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May 31, 2022 · 1 min read

गज़ल

मुस्कान उसके मन की उलझन बता रही है ।
गम को समेटे भीतर खुशियां जता रही है ।।

कड़वाहटों के घूंट वो पी चुकी कुछ इतने ।
जो भी मिली तिक्तता सब सहती जा रही है ॥

न जाने कितनी उम्र सब तन्हाईयों में काटी ।
सन्नाटे भी बोलते है समझाये जा रही है ॥

जोड़े थे दर्द के हिसाब वक्त की पेशगी को ।
ये आंधियों की साजिश पन्ने उड़ा रही है ॥

संभाला वजूद उसने थी रेत की तपिश जब ।
फिर आज क्यों तुहिन पिघलाये जा रही है ?

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