Oct 7, 2016 · 1 min read

गजल-३

काफिया-आते
रदीफ़-है
बहर-2122 12 12 22
“हक़ से हक़ छीन कर सताते है,
ये वफ़ा के अजीब नाते है।
——–
जब खलाओं में जश्न आते है,
इक दिए से भी जगमगाते है।
———
चुन के माथे चढ़े या कदमों पे,
फूल अपना नसीब लाते है।
——–
की बगावत भंवर ने जब मेरे,
खुद को मझधार बीच पाते है।
————-
भूलते बार बार तुझको फिर,
खुद को तेरा मुरीद पाते है।
———–
हसरतें कम नहीं इन आँखों की,
क्या हुआ दर्द के अहाते है।
————
दे गवाही मुझे तू है मेरा,
लोग तो साथ भी निभाते है।”
#रजनी

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