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Mar 1, 2022 · 6 min read

गजलकार रघुनंदन किशोर “शौक” साहब का स्मरण

गजलकार रघुनंदन किशोर “शौक” साहब का स्मरण
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पुस्तक का नाम / / चन्द गजलियातःआली मरतवत जनाब रघुनंद किशोर शौक रामपुरी//
संग्रह कर्ता एवं प्रकाशक नरेन्द्र किशोर “इब्ने शौक” //मुद्रक: सहकारी युग प्रिंटिंग प्रेस ,रामपुर (उत्तर प्रदेश)/ प्रकाशन वर्ष: मार्च 19 87 //कुल पृष्ठ संख्या 84
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समीक्षक : रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा, रामपुर (उत्तर प्रदेश )
मोबाइल 99 97 61 54 51
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चंद गजलियात श्री नरेन्द्र किशोर “इब्ने शौक” द्वारा प्रकाशित अपने पूज्य पिताजी श्री रघुनंदन किशोर” शौक” साहब की गजलों का संग्रह है। ऐसे पुत्र कम ही होते हैं, जो अपने पिता के काव्य को उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित कराएँ और पुस्तक के रूप में उसे जन- जन तक पहुँचाने का कार्य करें। एक पुत्र द्वारा अपने पिता को इससे बेहतर तरीके से कोई श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती।
इस पुस्तक के माध्यम से रघुनंदन किशोर “शौक” साहब और उनकी उत्कृष्ट लेखन- कला पाठकों के सामने आती है और निस्संदेह उनकी लेखनी पर मंत्रमुग्ध हो जाने का मन करता है । शौक साहब की मृत्यु को 27 वर्ष बीत चुके थे , जब उनका यह संग्रह उनके सुपुत्र श्री नरेंद्र किशोर जी ने प्रकाशित कराया। वास्तव में काव्य का आनंद अमर होता है और उस पर समय की सीमाओं का प्रभाव नहीं होता। यह एक अच्छा कार्य हुआ कि शौक साहब की रचनाएँ पुस्तक के रूप में सामने आ गईं और इस प्रकार सदा- सदा के लिए वह पाठकों को सुलभ हो गईं।
श्री रघुनंदन किशोर “शौक” साहब रामपुर की जानी- मानी हस्ती थे। आपका जन्म 23 जून 1894 को रामपुर में हुआ तथा मृत्यु 14 जून 1960 को रामपुर में ही हुई । इस तरह आप रामपुर की विभूति थे और आपका लेखन रामपुर की एक विशेष उपलब्धि कहा जा सकता है।
रघुनंदन किशोर “शौक “साहब के संबंध में उल्लेखनीय बात यह रही कि आप रामपुर के प्रसिद्ध समाजसेवी श्री मुन्नी लाल जी के दामाद थे । श्री मुन्नी लाल जी अपनी बनवाई हुई धर्मशाला के कारण रामपुर भर में प्रसिद्ध रहे, बल्कि कहना चाहिए कि अमर हो गए । मुन्नी लाल जी की धर्मशाला मिस्टन गंज के निकट चाह इन्छा राम में स्थित है । इसी के अन्तर्गत एक राधाकृष्ण मंदिर भी है , जिसके संबंध में श्री नरेंद्र किशोर जी ने लिखा है कि यहां “भगवान राधावल्लभ जी यवन शासित काल में श्री वृंदावन वासी हित हरिवंश गौरव गोस्वामी जी की विधि साधना से आसीन हुए ।संभवतः उस काल में यह रामपुर नगर का दूसरा सार्वजनिक मंदिर था । प्रथम मंदिर शिवालय था , जो मंदिरवाली गली में स्थित है। इसका शिलान्यास एवं निर्माण नवाब कल्ब अली खान ने आचार्य कैलाश चंद्र देव बृहस्पति के पितामह पंडित दत्तराम जी के अनुरोध से कराया था ।”इस प्रकार मुन्नीलाल धर्मशाला तथा राधाकृष्ण मंदिर के संस्थापक श्री मुन्नी लाल जी के आप दामाद थे । यहीं पर आपका निवास 1943 से 1960 तक रहा।
श्री रघुनंदन किशोर शौक साहब की रचनाएं देने से पहले नरेंद्र किशोर जी द्वारा अपने गुरु आचार्य कैलाश चंद्र देव बृहस्पति की सुंदर रचना भी पुस्तक में दी गई है । आचार्य बृहस्पति ऐसा व्यक्तित्व रहा कि जो उनके संपर्क में आया, वह उनका प्रशंसक बन गया। स्वाभिमान से ओतप्रोत राष्ट्रभक्ति से भरी इस कविता के कुछ अंश देखिएः-

भैरव गर्जन से गुंजित दिग् मंडल का कोना- कोना है /
रुधिर चाहिए आततायियों का इतिहासों को धोना है //
सिद्ध करो तुम वर्तमान में जीत सदा है हार नहीं है/ अरे प्रार्थना से झुकने वाला निष्ठुर संसार नहीं है//

कुत्ते भी हैं झूठे टुकड़ों को खाकर इतराने वाले /
दूर-दूर से भूखे मृगराजों का मुँह बितराने वाले/
वे क्या जानें भोजन उनका वेतन है आहार नहीं है/ अरे प्रार्थना से झुकने वाला निष्ठुर संसार नहीं है//

रघुनंदन किशोर “शौक” साहब के काव्य का मुख्य स्वर सामाजिक यथार्थ को सामने लाना है। आपने जीवन को निकट से देखा है और उसके व्यवहारिक पक्ष पर जोर देकर लिखा है । आपकी अधिकाँश रचनाएँ जीवन के आनन्द और उसके सकारात्मक पक्ष से संबंधित हैं । आपने शराब ,साकी और मयखाने को प्रतीक के रूप में जीवन के साथ जोड़ते हुए बहुत सी गजलें और बहुत से शेर लिखे हैं । इनमें आपका काव्य कौशल प्रगट हो रहा है । आपने शेख और बिरहमन जैसे शब्दों को भी अपने काव्य में स्थान दिया है तथा इसके माध्यम से धार्मिक आडंबर और वाह्य क्रियाकलापों की निरर्थकता को व्यक्त किया है
आपने रोजमर्रा की जिंदगी में छोटे-छोटे अनुभवों को भी अपने काव्य का आधार बनाया और उसे पाठकों तक पहुंचाया। इस दृष्टि से बहुत सादगी से कही गयी आपकी एक गजल के निम्नलिखित शेर उद्धृत किए जा सकते हैं :-

नासिहा मुफ्त ही उलझा है तू दीवाने से
बाज आया है न आएगा वह समझाने से

अपना-अपना है पराया है पराया आखिर
मुझसे नाराज हो क्यों गैर के बहकाने से

जितनी काव्य कुशलता के साथ अपनों से मित्रता की दौड़ में बँध जाने के लिए बात कही गई है , वह अद्भुत है यानि मुझे किसी गैर ने बहका दिया था और तुम तो मेरे अपने हो, इसलिए अपनापन न छोड़ो। यह बात कितनी सादगी से कुशलतापूर्वक शायर ने कह दी। एक और शेर देखिए:-

मत कहो शेखो बिरहमन की मुकामी खबरें
दोनों नाकाम फिरे काबा ओ बुतखाने से

यहाँ पर भी शायर ने इसी तथ्य की ओर इंगित किया है कि जो वाह्य उपासना में लगे रहते हैं , वह लोग ईश्वर को और उसके मूल स्वरूप को शायद ही ग्रहण कर पाते हैं। रघुनंदन किशोर “शौक” साहब की शायरी का मुख्य केंद्र जीवन की उस मस्ती से है जिसे उन्होंने साकी और शराब शब्दों के माध्यम से प्रकट किया है । देखिए :-

यह भी है रीत कोई “शौक “कि हर दम है नमाज
काम शीशे से न सागर से न पैमाने से ( प्रष्ठ 4 )

जीवन की बारीकियों को समझने के बाद आपने क्या खूब कहा है :-

न अपना है कोई न कोई पराया
वही है मुसीबत में जो काम आए ( पृष्ठ 11 )

ईश्वर पर विश्वास की दृढ़ता को दर्शाने वाला एक शेर ऐसा है जो इस बात को प्रकट करता है कि शायर को इस बात का पूरा भरोसा है कि जब तक ईश्वर उसके साथ है, उसे किसी की शत्रुता का कोई डर नहीं हो सकता। देखिए :-

बंदे की अदावत से तुझे खौफ है क्या “शौक”
मौला का तेरे हाल पर जब तक कि करम है
( पृष्ठ 14 )

इस बात को हालांकि बहुत से शायरों ने अपने-अपने अंदाज में लिखा है लेकिन शराब की बजाए साकी की निगाहों से पीकर मस्त होने की भावना को जिस तरह शौक साहब ने लिखा है, वह प्रशंसा के योग्य है:-

साकी तेरी निगाह को देखा है मस्त हूँ
तेरी कसम से एक भी कतरा पिया नहीं
( पृष्ठ 24 )

जीवन का आनंद लेने और उसी आनंद की अनुभूति में जीवन का सार समझने वाली बहुत सी काव्य सामग्री शौक साहब के संग्रह में है । इसी के कुछ नमूने देखिए:-

ये माना हमने वाइज जिंदगानी अपनी फानी है
मगर तौबा के दिन हैं दूर अभी दौरे जवानी है
(पृष्ठ 43 )

इश्के बुताँ में उम्र गुजारी जनाबे शौक
सच कहिए आप था यही पैमाने जिंदगी
( पृष्ठ 45 )

किसी शोख पर दिल फिदा हो गया
बुरा हो गया या भला हो गया
(पृष्ठ 16)

हर आदमी के लिए जब तक कविता जिंदगी की राह दिखाने वाली एक रोशनी नहीं बन जाती , उसका कोई महत्व नहीं है। कविता वही है जो जीवन में काम आए ।और इसी कसौटी पर शौक साहब का एक शेर बहुत उपयोगी और मार्गदर्शक कहा जा सकता है :-

है ये उम्मीद पहुँच जाएंगे मंजिल के करीब
राह में ठोकरें खा-खा के संभल जाने से
( प्रष्ठ 4)

पुस्तक में शौक साहब के सुपुत्र नरेंद्र किशोर “इब्ने शौक ” की भी कुछ कविताएं हैं , जिनको निसंदेह विचार और शिल्प की कसौटी पर श्रेष्ठता के स्तर पर रखा जा सकता है । पिता के पद चिन्हों पर चलते हुए उनके काव्य कौशल को आत्मसात करने की इच्छा पुत्र के लिए सर्वथा उचित है। इसीलिए शौक साहब के सुपुत्र ने अपना उपनाम” इब्ने शौक” ठीक ही रखा है। श्री नरेंद्र किशोर “इब्ने शौक” के उत्तम काव्य कौशल का एक नमूना उनकी एक गजल के कुछ शेर प्रकट कर रहे हैं :-

शीशे में ढ़ाली हिम्मतो सच्चाई की शराब
अब चोर डाकुओं का मेरे दिल में डर नहीं

बन्दा हूँ नेक बन्दों का मजलूम का वकील दौलत परस्त रहजनों का राहबर नहीं

निकला है आफताब अलस्सुबह इब्ने शौक
रातों के डाकुओं से कोई अब खतर नहीं
(प्रष्ठ 59 )

यह ऊँचे दर्जे के विचार हैं जो आदर्शों से भरे हुए हैं । इनमें “शराब” शब्द का उच्च मानसिकता के साथ प्रयोग इस बात को दर्शा रहा है कि पुत्र ने पिता के न केवल पद चिन्हों का अनुसरण किया है बल्कि वह और भी आगे चला गया है। पुस्तक को प्रकाशित हुए लंबा समय बीत चुका है ,लेकिन इतिहास में यह पुस्तक इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण है कि रामपुर (उत्तर प्रदेश ) में उर्दू के क्षेत्र में जिन महानुभावों का ऊँचा योगदान रहा है और उस योगदान को देवनागरी लिपि में प्रस्तुत करने का अनुकरणीय कार्य हुआ है, उसमें श्री रघुनंदन किशोर “शौक” साहब का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाएगा। उर्दू के कठिन शब्द अगर हिंदी -अनुवाद के साथ पुस्तक में जोड़ दिए जाते तो पुस्तक की उपादेयता और भी बढ़ जाती।

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