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Aug 16, 2017 · 4 min read

*झाँसी की क्षत्राणी । (झाँसी की वीरांगना/वीरनारी)

क्षिति पर अंधड़-सा आया,तलवार हाथ ले निकल पड़ी|

देख फिरंगी की छाती पर, अश्व-टाप धर आज चढी|


सुयश-वीरता खेल खेलती,*झाँसी की क्षत्राणी थी।

मातृभूमि की जय,जय रानी,बुंदेलों की वाणी थी।

अद्भुत तेज,अपार वीर रस, रोम-रोम पर झलक रहा ।

फँस गया फिरंगी फंदे में मर गया, बचा तो बिलख रहा ।

देखो ! विप्लव के कारण, बैरी की सेना, पिछल पड़ी।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।

क्षिति पर अंधड़-सा आया तलवार हाथ ले निकल पड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।


दत्तक, पृष्ठ भाग पर कस,उत्तर दिश को बढती जाती ।

निकट कालपी, सेना देखी,अश्व गिरा तब घबड़ाती।

रानी नीचे, कांटों से छिद गया सुतन, था हाल बुरा ।

देख सुअवसर अश्व लिया, छलकी आँखें ना देर जरा ।

सच कहूँ समय न था तुरंत ,कालपी त्यागी,विकल घड़ी।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।

क्षिति पर अंधड़-सा आया तलवार हाथ ले निकल पड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।


आगे बढ़ ,डाकू बरजोरा आया ,औ ललकार उठा ।

सीमा के अंदर देखा तो निर्दय मद-सिंह दहाड़ उठा ।

रानी बोली **भारतीय क्षत्राणी हूँ, न भेड़ हूँ मैं ।

तेरी गर्जन से डरूँ न हट, वरना तुझे उधेड़ दूँ मैं ।

नारी को आँखें दिखलाता, लगता तेरी अकल सड़ी।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।

क्षिति पर अंधड़-सा आया तलवार हाथ ले निकल पड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।


पीछे गोरों की सेना के, प्यादे आने वाले हैं।

लज्जा खाओ, देश हेतु हम मर-मिट जाने बाले हैं ।

बरजोरा पानी-पानी हो, बोला, जाओ लड़ता हूँ ।

गोरी सेना के सम्मुख,स्व छाती खोल के अड़ता हूँ ।

रानी लक्ष्मीबाई निकली,राष्ट्र-चेतना सबल पड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।

क्षिति पर अंधड़-सा आया तलवार हाथ ले निकल पड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।


युद्ध लड़ा बरजोरा ने ,छक्के छूटे शासन के

रोते-चिल्लाते गोरे, हिल गए पैर अनुशासन के।

सेना आई तत्क्षण घेरा, वीर कहे, जय हिंद देश।

तलवार मार ली निज तन में, जय भारत,जय जय स्वदेश।

झाँसी -रानी बच जाए, मैं मरूं न दुख ,तब सफल घड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।

क्षिति पर अंधड़-सा आया तलवार हाथ ले निकल पड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।


राम लला मंदिर-फाटक पर ,लक्ष्मीबाई खड़ी हुई ।

कोंच नगर अति धन्य हुआ, शुभ जयकारों की झड़ी हुई ।

तब तक गोरों की सेना ने, कोंच -किनारा घेर लिया ।

हुआ भयंकर युद्ध, जवानों ने, उन सबको ढेर किया ।

यह क्या ,सेना पुनि से आई, शत्रु-चाल कुछ सबल पड़ी।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।

क्षिति पर अंधड़-सा आया तलवार हाथ ले निकल पड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।


झाँसी -रानी निकल पड़ी, अविरल खूनी संग्राम हुआ ।

मारा,काटा,रूँदा,घेरा,बैरी डर -आयाम हुआ।

रानी ने शौर्य दिखाया तो,गूँज गया विजयी निनाद ।

तात्या का शुभ संग मिला, हो गया जीत का शंखनाद ।

फिर इक किला, ग्वालियर का भी,जीता,यह उपलब्धि बड़ी।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।

क्षिति पर अंधड़-सा आया तलवार हाथ ले निकल पड़ी।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।


जून ,अठारह सौ अट्ठावन, घेर लिया पुनि रानी को ।

***कोटा की सराई, ग्वालियर,फूलवाग में प्राणी को

मिली वीरगति, अश्रु आ गए ,****रामचंद्र रो रहा आज ।

यह चर्चा आग-सदृश फैली, रोता भारत का समाज ।

मातृ-सुतल को कर प्रणाम,सुर लोक गई,अति विकल घड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।

क्षिति पर अंधड़-सा आया,तलवार हाथ ले निकल पड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।


रानी के तन को छुपा रहे, ****राव आर सी झाडी में ।

छीने ना अंग्रेज ,लपेटा इसीलिए मुह साडी में ।

अवसर गह छिप-छिप कर निकले, मिली शहर तट इक कुटिया ।

जला झोपड़ी सहित आज शव, रानी का लघु – वाड़ी में ।

जन-आँसू अनवरत बहें, ग्वालियर रो रही खड़ी खड़ी।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।

क्षिति पर अंधड़ -सा आया तलवार हाथ ले निकल पड़ी ।

देख फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी।


गोरों के भय के कारण, शव जला त्रास-वस कुटिया में ।

किंतु सजगता-आँख खुल गई, आग लगी जन-चुटिया में ।

आँख चढ गई, चेता भारत, उगा एकता का सूरज ।

तरुण कह रहे उठो-बढो, झोंको बैरी को भटिया में ।

शोषण-ऊधम के खिलाफ, सचमुच जनता हो गई खड़ी ।

देख! फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।

क्षिति पर अंधड़-सा आया तलवार हाथ ले निकल पड़ी ।

देख ! फिरंगी की छाती पर अश्व-टाप धर आज चढी ।
…………………………………………………

*झाँसी की क्षत्राणी = झाँसी की वीरांगना/वीर नारी
**भारतीय क्षत्राणी=भारत की वीर नारी/वीरांगना

***कोटा की सराई=ग्वालियर का फूलवाग क्षेत्र

****रामचंद्र /राव आर सी =श्री राम चंद्र राव ,रानी लक्ष्मीबाई का अंग रक्षक|

………………………………………………………………

●उक्त रचना को “जागा हिंदुस्तान चाहिए” कृति के द्वितीय संस्करण के अनुसार परिष्कृत किया गया है।
● “जागा हिंदुस्तान चाहिए”कृति/काव्य संग्रह का द्वितीय संस्करण अमेजोन एवं फ्लिप्कार्ट पर उपलब्ध है।

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पं बृजेश कुमार नायक

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