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कोरोना की लहर

कोरोना की लहर ©

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गांव-गांव, हर डगर-डगर

बस्ती-बस्ती, हर शहर-शहर

घड़ी-घड़ी, हर पहर-पहर

तांडव करती, हर लहर-लहर

फैला है बस, एक ही जहर

खुदा भी ना कर पा रहा, कोई महर |

~~

लहरों की लहर, ये उठती है

जैसे खूंखार समुद्री, ठगती है

निर्मम घसीटते, ले जाती है

चीख पुकार, कुछ ना सुनती है

सीधे यमलोक, पहुँचाती है

कब ख़तम होगा, ये सिलसिला

कोरोना की, लहरों का ?

इंतज़ार कर लिया, हम सबने

अनगिनत, पहरों का |

~~

सूनी पड़ी है, सारी सड़कें

सूने पड़े, हर चौराहे

दूर-सूदूर, सन्नाटा पसरा है

खामोश है, हर एक राहें

बंद है बाजार

हर कोई लाचार |

~~

खिड़की-दरवाज़ों से, तकते चहरे

नुक्कड़-चौक, हर जगह पर पहरे

घरों में बंद, हर एक जान है

जान बची तो, लाखों पाए

अब इसी में, सबकी शान है |

~~

हर तरफ है, मौत का सांया

कैसा है ये, वायरस आया

चारों तरफ, उत्पात मचाया

असंख्य जिंदगियों, को उलझाया |

~~

ना कहता है, ना सुनता है

ना दिखता है, ना रुकता है

तेजी से है, फैलता जाता

स्वाद-सुगंध, सब छीनता

फैफड़ो को, निर्जीव बनाता

साँसों की है , डोर खींचता

क्या है ये ? कोई भूत-बला ?

नहीं इसका कोई, सबूत मिला |

~~

डर के मारे, कंपकपाता रुदन

बुखार से, तपतपाता बदन

लाशों के वो, सफ़ेद कफन

किसी को भी कर दे, सीधे दफ़न

सड़कों पर दौड़ती, एम्बुलेंस

आपातकालीन जरूरतों से,जूझता देश |

जीवन के लिये, तड़पता मानव

क्या खा कर रहेगा, ये दुष्ट दानव ?

~~

वेंटीलेटर पर, चलती साँसे

शमशानों में, अम्बार में लाशें

ऑक्सीजन कमी से, रूकती साँसे

तड़पती साँसे…, उखड़ती साँसे…

घुटती साँसे…, खिंचती साँसे…

रुक- रुक कर ये, चलती साँसे…

ये साँसों की, बड़ी बिमारी है

है भगवन! रहम कर अपने बन्दों पर

आज यहाँ साँसों की, बड़ी मारामारी है |

~~

कैसा ये, समय का फेरा है

चारों ओर, आतंक का डेरा है

दिन में भी मानो, घोर अंधेरा है

हर जान पर, कोरोना का सहरा है |

~~

अपनों के भी, मृत देह से

मुँह फेरते, अपने चेहरे

दाह संस्कारों से, दूर भागते

शव पहचान कर, भी नकारते

घृणा का ये, कैसा माहौल बना ?

मौत ने ऐसा, स्वाँग रचाया कि

संसार एक, जीवित शमशान बना |

~~

मंदिर-मस्जिद, और गुरूद्वारे

बेकार हो गए, सारे के सारे

वहां भी लेटकें है, ताले ही ताले

कहाँ जाएँ अब, फ़रियाद वाले ?

शायद ईश्वर ने भी, मुँह फेरा है

मानो अब यहाँ बस, राक्षसों का बसेरा है |

~~

चौर, ठग और, उददण्ड सभी

खुलेआम दादागिरी, करते कभी

घरों में दुबके, बैठे है आज

सबके सब भोले, बन बैठे आखिर

जाने क्या है, इसका राज ?

~~

पढ़- लिख हम सबने, समझ निखारी

सम्पूर्ण समाज की, सूरत संवारी

जात-पात से, हुए थे हम तीरे

फिर अब क्यूँ हो रहे, अछूत धीरे-धीरे ?

~~

भाग रहा, मानव से मानव

रिश्ते नाते, सब चूर हुए

वायरस बन गया, है दानव

ना चाहकर भी हम, एक-दूजे से दूर हुए |

~~

मुश्किल इस घड़ी से, है सबको उबरना

इस दरिया से हम सबको, पार उतरना

ताली,थाली,शंख और घंटी बजाई

टोर्च, दीये और मोमबत्ती जलाई

एकता की ताकत, इस घड़ी में सिखाई

किया है, लोगों कों आशवस्त

लड़ेंगे, जीतेंगे, होंगे वायरस मुक्त

बढ़ाएंगे इम्युनिटी, रहेंगे स्वस्थ |

~~

स्वास्थ्य, सफाई और, पुलिस कर्मी

दिखा रहे विकट घड़ी में, अद्भुत नर्मी

कर रहे हैं , दिन-रात जतन

देश के है वो, अनमोल रतन

नतमस्तक हो करुँ मैं,उनको नमन

सौ-सौ, हजार बार नमन |

~~

हाथ धुलवाये, मास्क लगवाए

चूक हो तो, डंडे खिलवाए

“देखो भाई देखो, ध्यान से जरा..

दो गज से ज्यादा कोई

बिलकुल पास ना आने पाए ”

गलेमिल सब, रिलमिल रहते

वो भी एक, जमाना था

रिश्तों में थी, अटल मजबूती

प्यार, बेशुमार था |

~~

सीख कोई देना चाहता है, वो ऊपर वाला

शायद कुछ कहना चाहता है, वो जगत निराला

विश्वास है जल्द ही होगा, नया सवेरा

जब कोरोना उठा भागेगा, अपना सारा डेरा

इसी के साथ समाप्त कर, कलम मैं रखती हूँ

इस महामारी से सब-जन उबरें,अरदास ये करती हूँ |

_______________________________________

स्वरचित एवं
मौलिक कविता

लेखिका :-
© ✍️ सुजाता कुमारी सैनी “मिटाँवा”
लेखन की तिथि :-5 मई 2021

2 Likes · 2 Comments · 175 Views
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