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Jul 23, 2016 · 1 min read

कोई नहीं पाले अनुशासन

कोई नहीं पाले अनुशासन
ना मैं, ना तुम,
और न हम सब
अभिभावक जन |

जब से रुपया हुआ है भारी
मानवता है बहुत दुखारी
भौतिकता ने खर्च बढाये
तुम भी खाओ मैं भी खाऊं
कर लेगें मंदिर में जाकर
चरणामृत सिर चढ़ा आचमन|

क्यों मेरे सूत सुता खटकते
करने दो जो कुछ वे करते
हम शासन का फण्ड चुराते
वे सोने की चैन उड़ाते
उनकी भी खर्चे की मद हैं
गर्ल फ्रैंड और महंगा वाहन|

बड़े शहर पढने को जाते
सडकों पर दिखते मडराते
मुख पर बांध दुप्पट्टा बेबी
बॉयफ्रेंड को मान हितैषी
होटल-पिक्चर जा शराब पी
तोड़ रहीं सीमाएं पावन|

कोई नहीं पाले अनुशासन
ना मैं, ना तुम,
और न हम सब
अभिभावक जन|

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