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Feb 25, 2019 · 3 min read

कृति-समीक्षा : ‘किसको कहूँ पराया मैं’

सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्ति देती कृति –
‘किसको कहूँ पराया मैं’
—————————-
रचनाकार – वीरेन्द्र सिंह ‘ब्रजवासी’
—————————————–
(समीक्षक – राजीव ‘प्रखर’,
मुरादाबाद, उ० प्र०)

सामाजिक सरोकारों से जुड़ी कृतियाँ समय-समय पर साहित्य-जगत में अवतरित होती रहती हैं। मुरादाबाद के वरिष्ठ रचनाकार श्री वीरेन्द्र सिंह ‘ब्रजवासी’ जी की उत्कृष्ट लेखनी से निकली, ‘किसको कहूँ पराया मैं’ ऐसी ही उल्लेखनीय एवं चिंतन-मनन करने योग्य कृतियों में से एक है। मानव-समाज के विभिन्न पहलुओं को स्पर्श करती कुल ६६ रचनाओं का यह अनूठा संग्रह, समस्याओं पर दृष्टिपात करने के साथ ही उनका समाधान भी प्रस्तुत करता हुआ प्रतीत होता है।
इस काव्य संग्रह की प्रथम रचना, ‘जन्मसिद्ध अधिकार समझ कर’ (पृष्ठ-२९), समाज के सफेदपोश एवं तथाकथित उजले वर्ग पर कड़ा एवं सार्थक प्रहार करती है। इस रचना की कुछ पंक्तियाँ देखिए –
“जन्मसिद्ध अधिकार समझ कर,
जिस को गले लगाया तुमने।
रिश्वतखोरी सूद-ब्याज को,
ही अधिकार बनाया तुमने।”
इसी क्रम में पृष्ठ ३१ पर, ‘सिर्फ़ अपने तक’ शीर्षक से रचना मानव को स्वयं की सोच तक सीमित न रह कर, स्वयं से इतर भी सोचने-विचारने को प्रेरित करती है। रचना की कुछ पँक्तियां स्थिति को स्पष्ट दर्शा देती हैं –
“सिर्फ़ अपने तक न अपनी, सोच हम सीमित करें।
ज़िदगी को ज़िदगी के, वास्ते जीवित करें।”
बेटियों का हमारे जीवन में क्या स्थान है, उनकी क्या महिमा है, इस अति महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील विषय से भी, कवि की मुखर लेखनी अछूती नहीं रही है। पृष्ठ ३५ पर उपलब्ध रचना, ‘आ गई बिटिया’ इस तथ्य का स्पष्ट समर्थन कर रही है, पंक्तियाँ देखें –
“आ गई बिटिया चलो खुशियाँ मनाएं,
धूप चन्दन से अनोखा घर सजाएं।
और तन-मन में समर्पण भाव भर कर,
हम सभी आभार ईश्वर का जताएं।”
आध्यात्म जैसे गूढ़ विषय को भी कवि अपनी जादुई लेखनी से सरल स्वरूप में प्रस्तुत करता है। इस दृष्टि से, पृष्ठ ४४ पर उपलब्ध रचना, ‘ईश सब को…’ की अंतिम कुछ पंक्तियों पर दृष्टिपात करें –
“प्यार पाने को तुरत ही, वैर की चादर उतारें,
अमरता पाने जहाँ से, अहम का कूड़ा बुहारें।
प्रभु अखिल संसार को तू, ज्ञानमय नवसृष्टि देना।
ईश सब को दृष्टि देना, आत्मिक संतुष्टि देना।” रचना निश्चित ही आध्यात्म की ओर उन्मुख करने के साथ जन-कल्याण हेतु एक सुंदर संदेश भी देती है।
वर्तमान राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार व ढकोसले को भी कवि ने बखूबी अपनी लेखनी रूपी तूलिका से साहित्यिक-पटल पर चित्रित किया है। पृष्ठ ५३ पर उपलब्ध रचना, ‘पेट हवा से भर लेना’ की प्रारंभिक पंक्तियाँ इस भ्रष्टाचारी तंत्र पर तीखा व सार्थक प्रहार कर रही हैं –
“दूर हुई थाली से रोटी, पेट हवा से भर लेना।
आज नहीं कल पा जाओगे, थोड़ा धीरज धर लेना।”
इसी क्रम में सामाजिक सद्भाव का सुंदर संदेश देती एवं देश की पीड़ा को ध्वनि देती हुई एक रचना, ‘कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान’ (पृष्ठ ६१) हमारे सम्मुख आती है –
“हिन्दू-मुस्लिम के झगड़ों ने, कर डाला हैरान,
कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान।”
थोड़ा आगे जाने पर देश के दुश्मनों को ललकारतीं एवं कड़े प्रश्न उठाती रचनाएं, ‘कब तक लहू बहाना होगा ?’ (पृष्ठ ६५) एवं ‘लहू गिरेगा सीमा पर’ (पृष्ठ ६७) दृष्टिगोचर होती हैं, जिनकी प्रत्येक पंक्ति दुश्मनों को चुनौती है, एक ललकार है।

कविता रूपी कुल ६६ मनकों से निर्मित यह काव्य-माला, हिन्दी भाषा की महिमा दर्शाती ‘सदाचार की भाषा हिन्दी’ (पृष्ठ १५८) शीर्षक रचना के साथ विश्राम पर पहुँचती है। रचना की ये पंक्तियाँ निश्चित ही मन को मोह रही हैं –
“सदाचार की भाषा हिन्दी, सतत प्यार की आशा हिन्दी,
पावन, कोमल, सरस, सत्य है, जीवन की परिभाषा हिन्दी।”

इस अनमोल कृति की एक अन्य विशेषता यह भी है कि, विभिन्न सामाजिक विषयों पर लेखनी चलाते हुए रचनाकार कहीं भी, कथ्य एवं लयात्मकता से नहीं हटा है जिस कारण कृति की रचनाएं, संदेशप्रद होने के साथ-साथ पाठकों/श्रोताओं को एक प्रकार से काव्यात्मक आनंद की अनुभूति भी कराती हैं।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि, श्री वीरेन्द्र सिंह ‘ब्रजवासी’ जी की उत्कृष्ट लेखनी से निकल कर तथा आकर्षक छपाई के साथ सजिल्द स्वरूप में, विश्व पुस्तक प्रकाशन जैसे उच्च स्तरीय प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित होकर, एक ऐसी अति उत्कृष्ट व अनमोल कृति साहित्य-पटल पर अवतरित हुई है, जो वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों का सच्चा मार्ग दर्शन करने में पूर्णतया सक्षम है। इस अनुकरणीय एवम् सारस्वत अभियान के लिए, कवि एवं प्रकाशन संस्थान दोनों ही बारम्बार अभिनंदन के पात्र हैं।

काव्य कृति-
‘किसको कहूँ पराया मैं’

रचनाकार –
वीरेन्द्र सिंह ‘ब्रजवासी’

प्रकाशन वर्ष – २०१९

प्रकाशक –
विश्व पुस्तक प्रकाशन, नई दिल्ली

कुल पृष्ठ – १६०

मूल्य – ₹ २५०/-

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