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कुण्डलियाँ

कुण्डलियाँ छंद
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नफ़रत का अब घुल गया, धुआँ अनिल में आज।
प्रेम मिटा कर हो गया, गंदा आज समाज।।
गंदा आज समाज,घर- घर हुए आतंकी।
कानून करता है, जनता संग नौटंकी ।
कह “प्रीतम कविराय, देखिए बिगडे़ हैं सब।
बजता डंका चहुँ ओर यहाँ, नफ़रत का अब ।।

प्रीतम राठौर भिनगाई
श्रावस्ती (उ०प्र०)

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