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#रुबाई

#रुबाई

निश्छल मनहर मंज़र मुझको , हँसके यहाँ लुभाने आये।
दिल की चौखट पर चाहत का , सास्वत दीप जलाने आये।।
घायल मन जब तड़फ रहा था , नींद उड़ी थी नम आँखों से;
भूले किस्से मरहम बनके , थपकी संग सुलाने आये।।

#आर.एस. ‘प्रीतम’
#सर्वाधिकार सुरक्षित रचना

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