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कितनी पीड़ा कितने भागीरथी

इस पीड़ा के पीछे
भी कई पीड़ाएँ हैं
हटाकर परदा देख
कितनी शिलाएं हैं।।

अनगिन आवरण
अनगिन आहरण
अनगिन आचरण
ज्यूँ किसी वृक्ष में
पंछी का पदार्पण।।

खो गई एक शिला
राम के इंतज़ार में
तैर गई दूजी शिला
राम के ही प्यार में।।

तन लपेटे भागीरथी
मन समेटे मृगतृष्णा
भोर में लो कैद हुई
पग-पग-पग ये तृष्णा।।

शबरी के जूठे बेर
केवट सम वो भाव
चलो लक्ष्मण चलें
देखें सीता के पाँव।।

किंचित इस घड़ी में
हैं अपावन कुछ दृश्य
किन्तु कुंती कौन यहाँ
मांगे दुःख जो अदृश्य।।

अनजान साया स्याह
तन और मन भेद का
अत्र कुशलम तत्रास्तु
आरोग्य मंत्र वेद का।।

*सूर्यकांत

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