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घर आंगन

घर आंगन
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तबादला होने के बाद रामबाबू नये नगर में रहने लगे । परिवार में में दो बेटियां एक बेटा था । पत्नी सरिता व्यवहार – कुशल और धर्मपारायण थी ।
सुहागी नगर में किराए का घर लेकर रहते हुए सोलह साल बीत गये । तीनों बच्चों का यहां जन्म हुआ , इस कालखंड में कभी ऊंच-नीच बात नहीं हुई । उनके परिवार से अपनत्व , भाईचारा सदा कायम रहा ।
सरिता एक समझदार महिला थी ,उसने घर के सामने आंगन बनाया और टिपटी ,ओटा का निर्माण भी किया । बाहर की ओर क्यारी बनाकर फूल पौधे रोपे कुछ दूरी पर आम , गुलमोहर ,वादाम , आनार के पेड़ भी लगाए । आंगन के बीच तुलसीधरा में सालगराम की मूर्ति स्थापित की , संध्या काल प्रतिदिन दीप जलाकर मां के साथ बच्चे भी आरती करते ।
रामबाबू के शिशुओं के संग पेड़- पौधे बड़े होने लगे । अवकाश के दिन उनकी छाया में व्यतीत होता । समय पंख लगाकर उड़ने लगा । दम्पति के साथ बच्चों को भी उनसे गहरा लगाव था। ग्रीष्म आते ही मोहल्ला -पडौस के बच्चों की टोली घनेरी छाया तले खेल कूद कर आनंदित होती ।
धार्मिक पर्वों के अवसर पर परिचित , अपरिचित व्यक्ति उनकी बगिया से फूलों को लेकर जाते । पुष्पों को देते समय सरिता के हृदय में प्रसन्नता भाव रहता।
आज कार्यालय में रामबाबू को स्थानांनतरण का आदेश प्राप्त हुआ । घर में चूल्हा नहीं जला । कहते “गाय को खूंटे से प्रेम हो जाता है ।” उनकी स्थिति ठीक वैसी हो गई। बुझते मन से समान पैक किया ।
निवासस्थल छोड़ते समय सभी के चेहरों पर उदासी स्पषट दिख
रही थी । बच्चों के बचपन के साथी -सहपाठी बिछड़ रहे थे, सबसे अधिक दुःख
बच्चों को हुआ , उनकी जन्मभूमि छोड़कर जाना मजबूरी बन गया । नम आंखों से स्नेहीजन से बिदा हुए । जाते समय आंगन , ओटा , पेड़ – पौधे की बगिया देख नयन बरस गये ,वो प्रकृति के चरणों में प्रणाम कर रहे थे।
रामबाबू के परिवार को सेवास्थल पर आये छः माह बीत गए ,समस्त परिजन उस जगह को नहीं भूले । संध्या को भोजन करते समय छोटी बिटिया ने पिता से कहा – ” पिताजी ! एक बार हम उस नगर चलें , बहुत याद आती है । ” सरिता निकट बैठ भोजन परोस रही थी उसने बेटी की बात का समर्थन किया। वो स्वंय जाने की इच्छा रखते थे किन्तु अभिव्यक्त नहीं कर पाए ।
रविवार के दिन सुहागी जाने की योजना बनाई । सुबह से सफर की तैयारी पूर्ण कर आटो से प्रस्थान किया । बच्चों और सरिता के चेहरों पर विशेष चमक थी । वाहन गंतव्य की ओर चल दिया , सभी के हृदय अधीरता से प्रतिक्षा कर रहे थें कब हमारा घर आए ।संगी – साथीयों से भेंट हो , हाल -चाल जाने ।तरह – तरह के विचार मन में आ रहें थे ।
वाहन गंतव्य पर पहुंचा , उतरते ही होश उड़ गए । पूरा परिवार स्तंभित ,आंखों से आंसू बह निकले क्योंकि पेड़ काट दिए ।नगर विकास के उद्देश्य से सीवर लाइन डाली थी इसलिए पेड़ों की बलि चढ़ा दी । मानव की उन्नति में बाधक निर्दोष पेड़ – पौधों की आहूति चढा़ दी गई । घर आंगन प्रगति की दौड़ में पीछे छूट गए।
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स्वरचित
शेख जाफर खान

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