Sep 20, 2016 · 1 min read

कविता

बुद्ध, जैन, सिख, ईशाई, हिन्दू, मुसलमान
सबका मत एक ही है, क्षमा ही महा दान |

हर धर्म मानता है क्षमा, शांति का है मूल
जानकर भी फैलाते नफरत, क्यों करते यह भूल ?

त्यागना होगा खुद का स्वार्थ, करके अंगीकार
त्यागना होगा भेद भाव, धन जन का अहंकार |

धर्म के नाम से धंधा कर, बोते हैं विष वेल
क्षमा-अमृत, ईर्ष्या-विष में नहीं है कोई मेल |

होते सच्चे धर्मात्मा, मन से सुन्दर क्षमाशील
सुदृढ़ विश्वास, प्रवुद्ध, उदार, असीम सहनशील |

उत्तम गुणी परोपकारी जो, होते जगत में क्षमावान
क्षमा मांग कर सबसे, करते सबको क्षमा दान |

होगा जब हर व्यक्ति क्षमावान, शांति होगी देश में
हिंसा, द्वेष, ईर्ष्या का स्थान, नहीं रहेगा ह्रदय में |

सामर्थ्यवान और बुद्धिमान का क्षमा है उत्तम गुण
कायर, कमजोर और बुद्धिहीन होते है सदा निर्गुण |

© कालीपद ‘प्रसाद’

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