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कविता 100 संग्रह

1. वीरान मेरा यह गाँव
ओह ! मेरा यह गाँव
कितना वीरान हो चुका है
घर, आंगन
तब्दील हो चुके हैं
खंडरो, मकड़ियों के जालों में
खेतों, की लहलहाती हूई
वो फसल, यादों का एक किस्सा
बन गई हैं
घरों की, आंगन की
वो किलकारीया
गूँज रही हें
अब शहरों में
वो हरे, भरे, चीड़, देवदार के वन
अब झुलश रहें हैं
आग की तपिश में
रंग, विरंगे फूल,
चिड़ियों, भंवरों का शोर
अब एक रुदन सा
अहसास कराता है
सुर्य, का उदय, अस्त होना जारी है
परन्तु घरों के वो किवाडें
अभी भी बंद हैं
और राह देख रही हैं
अपनों के आने का
वह घरों के कुल देवी, देवताओं
का मंदिर वीरान है
ओर बरसों से बुझा हूआ है
वो माटी का दिया
जो रोशनी से उज्जवल होता था
घरों में कभी
वह घंटियों की आवाज
मानो चीख पुकार कर रही है
और कह रही है –
तुम कब आओगे ?
दीख जाते हैं यहां,
कभी, कभी वो बूढ़े हूए कंधे
आस लगाए, टकटकी आंखों से
अपने घरों के खिड़कियों में
उन रास्तों, खेतों, जंगलों का
यह अब सूनापन
उकेर रहा है, हृदय में
उन भूली बिसरी यादों को
जब संग, साथी, दोस्त
जाते थे एक दूजे के
कंधों में हाथ, रख कर
जब कभी दूर सड़क पर चलती हुई
बस से उतरता है कोई मुसाफिर
घरों की वह विरान आंगने
कह उठती हैं
शायद मेरा कोई अपना
मुझे चाहने वाला आया है ।।
2. धन, दौलत
आज इंसान को
इंसान से लड़ते हुए देखा

इन धन, दौलत की खातिर
आपसी रिश्तों को
तार-तार होते हुए देखा
झूठ को नसीब तख्तो ताज
सत्य को फिर सूली
चढ़ते हुए देखा
आज इंसान को
इंसान से लड़ते हुए देखा

मैं बड़ा, तू छोटा,
मैं धर्मी, तू अधर्मी
सब में कूट-कूट कर भरा अहम देखा
बेटे को पिता से,
भाई को भाई से
कितने घर अलग होते हुए देखा
आज इंसान को
इंसान से लड़ते हुए देखा

इस जमीन, दौलत की खातिर
बहुतों के ईमान
बिकते हुए देखा
आज इंसान को इंसान का ही
रक्त रंजित करते हुए देखा
सत्य का अब कहां बोलबाला
सब के मुंह पर सफेद झूठ देखा
आज इंसान को
इंसान से लड़ते हुए देखा ।
3. ॐ हरि भजन
ॐ हरि हरि,
ॐ हरि हरि
जन्म गयो
मेरो तरी, तरी
जब से मुख से निकला
ॐ हरि हरि
बोल ॐ हरि, हरि
ॐ हरि, हरि
कितना सुंदर
प्यारा यह नाम
ॐ हरि, हरि
जन्म गयो
मेरो तरी, तरी
बोल ॐ हरि, हरि ।

हरि, हरि, हरि बोलू
मिठो सो जीवन में
यह रस घोलु
कान्हा की बंसी हरि बोले
सांवरिया सी मूरत हरि बोले
मन मेरा देखो हरि बोले
तन मेरा अब हरि बोले
ॐ हरि, हरि, ॐ हरि, हरि
जन्म गयो, मेरो तरी, तरी
बोल मनवा मेरे अब तू
ॐ हरि, हरि
हरि, हरि, हरि बोल
जीवन में मिठो स रस घोल
बोल ॐ हरि, हरि ।।
4. माँ
मां तेरे आगे निशब्द में
कैसे करूं तेरा बखान
तुझे कहूं,
बहता पावन, गंगाजल
या फिर वेद, कुरान

तुम ही गुरु,
मेरे पहले ज्ञान की
तुझसे ही तो माँ
मेरी यह पहचान,

तुम ही तो हो जननी
इस प्रकृति, ब्रह्माण्ड की
तेरे समक्ष नतमस्तक
ब्रह्मा, विष्णु, महेश
व संपूर्ण यह जहान

मां रूप तेरे अनगिनत
तुम ही परिभाषा
प्रेम, त्याग की
तुम से ही
उपजित शब्द यह बलिदान,

मां तेरे आगे निशब्द में
कैसे करूं मैं,
नादान तेरा बखान
मां तुम महान,
तुम महान, तुम महान ।।
5. तेरा यह शहर
इन शहरों के, रात के अंधेरों में
डरा, डरा, सा सहमा रहता हूं
दिन के इन उजालों में
अनगिनत इन भीड़ों के
घेरों में घिरा रहता हूं
रोज स्वपन बुनता हूं
अपनी ही धुन में रहता हूं
राते यह काली डसती रहती है
हर नजर मुझे नागिन सी लगती है
हर मुखोटे पर चढ़ा यहां नकाब है
हर नजर अब करते वार हैं
मीठी मीठी बातों का
जहर यहां घुल रहा
हर शख्स का, अंतर्मन यहां जल रहा
आंखों में सब की
यहां तरकस के तीर हैं
नजर हटी तो, सीने के दो चिर हैं
हवाओं का मौसम यहां
पल, पल, बदल रहा
हर कदम हर चौराहे पर
कोई ना कोई बनकर बहरूपिया
यहाँ छल रहा
अजब इस शहर की रीत है
लाशों के ढेरों पर चढ़कर
मिली सबको यहां जीत है
6. आकृतियां
बनती बिगड़ती
यह आकृतियां
खेल जीवन का
दर्शाती यह आकृतियां

कुछ सीधी सरल
कुछ टेढ़ी-मेढ़ी
अनगिनत भावों को
दर्शाती यह आकृतियां

कुछ तेरे मन की
कुछ मेरे मन की
यह आकृतियां

ह्रदय से उपजे
यादों को लिए
उफ़्फ़ –
कितनी चुभन भरी
यह आकृतियां

घिर जाती है
जब याद तेरी
बन जाती है
मेरे ह्दय मैं भी
तेरे छवि की
यादों से भरी
वह आकृतियां

नैन, तेरे जब भी
रोते हैं मेरे लिए
मुझे बहुत रुलाती हैं
तेरी ये आकृतियां
7. हाइकु
1-
दिल रोता है
जैसे बन बादल
क्या वो आएंगे

2-
खिलते फूल
वन, उपवनों में
ह्रदय खुश

3-
प्रेमी युगल
गाए प्रेम का गीत
जग से बैर

4-
आए त्योहार
खुशियों की बहार
जि बेकरार

5-
यह डगर
नहीं है मुशिकल
हौसला रख
8. उफ्फ
उफ्फ ये धर्म के झगड़े
जातपात की नफ़रतें बड़े नासूर
भरते नहीं, जाते नहीं

उफ्फ ये मंदिर, मस्जिद
राम, रहीम की लड़ाई
खत्म होती नहीं, मिटती नहीं

उफ्फ ये मन के रावण,
हमारे मरते नहीं
राम ह्दय मैं अब बस्ते नहीं
उफ्फ ये मेरा “मैं ”
उनका “वहम ” अब तक गया नहीं

उफ्फ एक गरीब सोया रहा
रात भर सीढ़ियों पर
उफ्फ ये हमें
अब तक दिखा नहीं
उफ्फ यह अकड़ का कम्बल
हमारे अब तक उतरा नहीं

उफ्फ ये मेरी, उनकी, बेरोजगारी
संसद के गलियारों मैं
अब तक गूँजी नहीं
उफ्फ ये देश के
सफेद नकाबपोशों के वादें
खत्म होते नहीं

उफ्फ ये मेरी
गली, घरों, के टूटी हूई छत, सड़के
क्यों इनको अब तक दिखी नहीं

उफ्फ ये धर्म के झगड़े
जातपात की नफ़रतें
खत्म होती नहीं,
मिटती नहीं ।
9. हम किसी से कम नहीं
क्यों तुम मुझे रोकते हो
घर से बाहर जाने में
क्यों तुम मुझे टोकते हो
देर रात लेट आने में,

मैं भी अब –
कुछ कर दिखाना चाहती हूं
करके इस मातृभूमि की सेवा
जीवन अपना सफल बनाना चाहती हूं,

बेटों का ही हक नहीं
मातृभूमि की सेवा में
सोच समाज की ये
मैं अब बदलने को तैयार हूं
पहन कर इस वर्दी को,
सर दुश्मनों के,
धड़ से अलग करने को अब तैयार हूं,

मैं भी छू सकती हूं
शिखर हिमालय का
मुझसे ही बहती
यहां से गंगा की धार है,

मुझसे ही सृष्टि है आरंभ
बिन मेरे जीवन
सबका निराधार है
मैं ही तो,
यह मातृभूमि भूमि
मैं ही इसकी पालनहार हूं
मुझसे ज्यादा इसको कौन समझे
मैं ही इसकी खेवनहार हूं,

क्या हम भूल गए
एक भारत की बेटी
” कल्पना ” ने अंतरिक्ष में उड़ान भरी थी
महान लक्ष्मी बाई –
दुश्मनों से निडर होकर लड़ी थी

पहन इस वर्दी को
मान, सम्मान देश का बढ़ाऊंगी
बेटियां नहीं किसी से अब कम
यह अध्याय भी लिख जाऊँगी ।।
10. दुल्हन
बनकर दुल्हन पिया
घर तेरा मैं महकाउंगी
आंगन में बनकर खुशियां
जीवन तेरा चहकाऊंगी ।

दुख तेरे, तेरे अपने,
सारे मेरे अब
छोड़ बाबुल का घर
जब पिया तेरे घर में आऊंगी ।

वचनों में सिया वन (माता देवी सीता )
सातों वचन निभाऊंगी
हे मेरे पिया,
तुम मुझे ना समझना अबला
हर पथ, हर डगर, तेरे संग
कांटो पर भी चल कर दिखाऊंगी ।

तुम, मैं, अब रूप अर्धनारीश्वर
तुम हो मेरे प्राणों से
ज्यादा अब मुझे प्रिय
तुम बिन जुदा होकर
अब मैं कहां जी पाऊंगी ।
11. वो घुमावदार पीपल
वो पगडण्डीयां, वो रास्ते
अब भी जाते हैं तेरी उन गलियों को
जहाँ अभी भी खड़ा है
वह पुराना पीपल का
विशालकाय घुमावदार वृक्ष,

अब भी दिखाई दे जाती हैं
वहां पानी भरती हुई कोई पंनवारन
फर्क अब इतना है,
पीपल का वृक्ष, रास्तें वहीं है
सिर्फ तेरी याद घुल सी गयी हैं
उन सदियों से चली आ रही
उन फिज़ाओं, हवाओं मैं,

देखता हूं जब कभी
में तेरे उस घर को
घेर लेती है तेरी यादें मुझे
कर देती है मेरी चेतना मुझे शून्य
हो जाता हूं मैं मूक
टूट जाते हैं मेरे मस्तिष्क के भ्रम,

और याद रह जाता है सिर्फ
तेरे मेरे मिलने की जगह
वह घुमावदार पीपल का वृक्ष ।
12. वसंत गीत
देखो सखा,
कली यह सुंदर शोभायुक्त खिल आई है
ऋतु लिए एक नव आगमन का
होकर प्रफुलित, हर्षोल्लास
जैसे होने वाला कोई नवपरिवर्तन,

बोया अंकुर किसी ने
या स्वयं होकर अंकुरित
इस वसुंधरा पर उग आई है
देखो सखा,
कली यह सुंदर शोभायुक्त खिल आई है ।

वन के इस उद्यान मैं
भू, नीर, तना,
कुछ उसके संग साथी है
कुछ निर्मोही, हठीले
तीव्र प्रवाह पवन के झोंके
संघर्ष उसे जीवन का सिखाते हैं,

देखो सखा,
ज्यो, ज्यों होगी यह दीर्घ
महकाएगी इन उपवनों को
बैठेंगे इस पर नभचर पखेरू
गाएंगे प्रेम के मधुर तराने ।

कली जब यह तरु बन जाएगी
ऋतु चक्र मैं झड़, झड़ बीज गिराएगी
देखो सखा,
इन नवनिर्मित बीजों से
कली कोई सुंदर, शोभायुक्त,
करके उल्लास फिर खिल आएगी ।
13. प्रेम
सोचूँ जो मैं तुमको रातों मैं
तुम ख्वाबों मैं आ जाती हो
दिन, पहर मेरा अब कटता नहीं
दिल मैं मेरे तुम
प्यार का गीत गुनगुना जाती हो

सोचूँ जो मैं तुमको रातों मैं
तुम ख्वाबों मैं आ जाती हो ।

तेरे पायल की यह झन, झन
मुझे बेचन सी कर देती है
खामोस रहता हूँ अक्सर में
जब, जब तुम सामने मेरी आती हो

सोचूँ जो मैं तुमको रातों मैं
तुम ख्वाबों मैं आ जाती हो ।

तेरा हँसना, तेरा शर्माना
अदाएं है कातिल यह तेरी
बातों से तुम अपनी
जीवन में मेरे
प्यार का रंग घोल जाती हो

सोचूँ जो मैं तुमको रातों मैं
तुम ख्वाबों मैं आ जाती हो ।

मन, मंदिर में, मेरे अब
तुम दुल्हन बन कर रहती हो
प्रीत जगी है
दिल में मेरे, तेरे लिए
तुम मुझे पागल प्रेमी कहती हो

सोचूँ जो मैं तुमको रातों में
तुम ख्वाबों में आ जाती हो ।
14. हृदय
हृदय मेरा बिन तेरे
एक खाली मकान सा
भटकता फिरता, खुद में ही
खुद ही तन्हा,
खुद ही वीरान सा ।
मन मेरा यह बावरा
जग की मुझे फिक्र कहां
खुद को ही,
खुद में, अब ना जानु
भुला में अपनी पहचान सा
हें जो ये मेरे घर की
छतें, दर्रे, दीवारे,
कहती हें मुझसे
खुद से ही क्यों
तू इतना अनजान सा हृदय मेरा बिन तेरे
एक खाली मकान सा ।
15. इंकलाब
मैं इंकलाब फिर लाऊंगा
मर चुका जो हमारा पुरुषार्थ
मैं फिर उसे जगाऊंगा
मैं इंकलाब फिर लाऊंगा ।

क्या हूआ जो उड़ना हम भूल गए
अपने कर्तव्य भूल गए
फिर मैं नए पंख लगाऊंगा
आकाश चीर कर दिखाऊंगा
अपने कर्तव्य निभाऊंगा
मैं इंकलाब फिर लाऊंगा ।

गली-गली गांव-गांव घर – घर
मसाल फिर वही
क्रांति की जगाऊंगा
बन नेक इंसान
राह सबको एक नई दिखाऊंगा
मैं इंकलाब फिर लाऊंगा ।

मैं गीत फिर प्यार के गाऊंगा
नई कोपलें उगाऊंगा
पीछे छूटे हाथों को
संग अपने साथ चला कर गले लगाऊंगा
मैं इंकलाब फिर लाऊंगा ।

बेशक अब ना हो गुलाम देश सही
दीमक जो लगा भ्रष्टाचार का
हमारे रग, रग मस्तिक में
वह भ्रष्टाचार मिटाऊंगा
मैं इंकलाब फिर लाऊंगा ।

देश जब घिरा हो दुश्मनों से
मैदाने जंग में तब कूद जाऊंगा
मुझे है तिरंगा
अपनी जान से प्यारा
होकर शहीद देश के लिए
प्राणों की बाजी लगा जाऊंगा
मैं इंकलाब फिर लाऊंगा ।
16. जय हिंद, जय भारत
रहकर माटी हिंदुस्तान की में
पश्चिमी सभ्यताएं अपनाते हो
भारत कहने में हमें लाज शर्म है
इंडिया, इंडिया कह कर
गर्व से क्यों तुम फुले समाते हो,
छोड़े हमने धर्म-कर्म अपने
वेद, पुराणों मैं लगा दिए अब जालें हैं
जात, पात पर हम लड़ते फिरते
वीर पुरुषों, वीरांगनाओ को हम भूल चुके
इतिहास हमने बदल दिए डाले हैं,
संस्कृत रह गई किताबों मैं
हिंदी अब यह लड़खड़ाई है
हेलो हाय तक सीमित
रह गए ये रिश्ते नाते
जब से यह इंग्लिश अपनाई है,
मना लो तुम चाहे
जश्न आजादी का
पर अब भी कुछ लोग भूखे सोते हैं
बेचकर तिरंगा सड़कों पर
आजाद भारत के आईने की दुहाई देते हैं,
भूमि भारत को
मां की संज्ञा दी जाती है
आजाद वाले भारत में
अभी भी गर्भ में बालिकाएं
मार दी जाती है,
उद्घोष जय हिंद का
हर बार आजादी दिवस पर करते हो
छल कपट करके पुनः
फिर इस भारत को क्यों तुम लूटते हो ।।
17. वसीयत
उम्र हो गई है अब सत्तर
बुढ़ापा अब होने लगा है बदतर
घिरने लगी है
चेहरे पर काली छाइयां
पीछे छुटने लगी है
मेरी परछाइयां
चलना फिरना होने लगा है अब दुर्लभ
शरीर दिखाने लगा है
अब अपना यहां करतब
कैश कब के यह
मेरे सफेद हो गए
कुछ संग, कुछ मेरे साथी
वक्त के वो भी
आगोश में सो गए
सोच रहा हूं मैं भी
अपनी वसीयत लिख डालूं
वक्त का क्या भरोसा
पहले यह काम कर डालूं
वसीयत मेरी पढ़कर
लानत मुझे देना नहीं
जीवन रहा
मेरा यह फकीर
धन दौलत जमीन
जोड़ा नहीं
मिले मुझे जो संस्कार
वो मैं छोड़ा नही
सुना है वसीयत में लोग
लाखों छोड़ जाते हैं
कुछ बूढ़े मां, बाप
वक्त से पहले ही मार दिए जाते हैं
मैं दे जाऊंगा तुम्हें
बुद्धिमता, अभय, संयम, न्याय
अपने पूर्वजों के संस्कार
असत्य से लड़ने का ज्ञान
बना जाऊंगा
तुम्हें आत्म स्वावलंबी
चला हूं मैं भी
इस पथ पर
तुम भी चलना
धन दौलत
ना मिले तुम्हें बेशक
बन कर जग में
मर्यादा पुरुषोत्तम
श्री राम जैसे रहना ।।
18. जय श्री राम
राम मिलन की बेला आई
झूमें यहां सब नर, नारी
झूमें है अवध
झूमें यह वन
उपवन, धरा
देखो रघुकुल मैं
फिर खुशियां छाई
राम मिलन की बेला आई ।

आगे, आगे प्रभु राम
संग लिए, माता को
है हर्षित, भाई लक्ष्मण
धुन राम नाम की
जपे भक्त हनुमान
छट गए बादल अब
काली अमावस्या के
रघुकुल हूआ
फिर उजियारा
देखने अपने प्रभु को
जो जैसा था
दौड़ा आया
राम मिलन की बेला आई ।।

कहीं जले दिए
किसी ने फूल
प्रभु के हर
पग मैं बिछाए
है चौदह वर्ष का
वनवास काटा
माताओं ने बेटे
अब अपने गले लगाए
राम मिलन की
बेला आई ।।
19. ख्वाबों का तकिया
तकिए के नीचे
कुछ ख्वाब पलते हैं
और मिलते हैं
रोज सपनों में
कभी कराते हैं
एहसास मखमली सा
कभी रुदन शोर
सुनते हैं
मेरे ह्दय का
पसर जाती है जब
तनहाइयां चारों ओर
घिरा हुआ होता है अंधेरा
तब छोड़ देती है रूह मेरी
मेरे इस शरीर का
हुआ पड़ा होता हूं
मैं निर्जीव
ना जाने किस
अवस्था में
फिर भी ये ख्वाब
याद दिलाते है मुझे
अपना अतीत, वर्तमान
और
सजीव होने का
मुझे एहसास
कुछ ख्वाब बुने हुए
मेरे बुनाई जैसे
कुछ दबे हुए ही
रह जाते हैं
अब भी इस
तकिए के नीचे
20. प्रेम सुधा बरसाओ ना
प्रेम सुधा बरसाओ ना
तन मन मेरा
यह कब से व्याकुल
अब तो गले लगाओ ना
प्रेम सुधा बरसाओ ना

बीत गया मौसम पतझड़
बीत गया मौसम सावन
अब आया यह
अलबेला बसंत
अब तो गले लगाओ ना
प्रेम सुधा बरसाओ ना

खिली हुई देखो
पीली सरसों
नभ में टिम टिम करते तारे
प्रेम गान
अब तुम कोई गाओ ना
प्रेम सुधा बरसाओ ना

कब तक बांधोंगे
तुम मुझको ढांढस
सजी महफिलों से तेरी
में लोटा हूं बेरंग
अब तो नैन मिलाओ ना
प्रेम सुधा बरसाओ ना

ताकू तुझको अब मैं
हर, पहर
है जग बड़ा यह बेरी
घर आंगन मेरे
दुल्हन बन आओ ना
प्रेम सुधा बरसाओ ना

बनकर मन के
तुम मेरे मीत
हृदय में प्रेम
ज्योत जलाओ ना
प्रेम सुधा बरसाओ ना
21. हाथ मे शिक्षा, मस्तिष्क मैं अंधविश्वास
आँखों को अपनी कब खोलोगे
हो तुम मुर्दा
तन से मन से
अपने मस्तिष्क से,
जिंदा होने का है वहम
तुम्हें सिर्फ
अपने इस तन का,

वहम तुमने फिर भी
अपने मस्तिष्क में पाले
लेकर हाथ मैं यह शिक्षा, डिग्रीया
जकड़े हो तुम
इन अंधविश्वासो के फेरो मैं
कब तक मानोगे
इस छुवा, छुत, को

लेकर ज्ञान का दिया
जलाते हो क्यों नहीं
रोशनी अपने अंतर्मन मैं
करके तुम पाप
कहते हो
गंगा मैं नहा के आया
जितने थे पाप बहा के आया

यह तुम्हारी रूढ़िवादी सोच
अब तुम किस, किस पर थोपोगे

है रक्तस्राव निकलना मासिकधर्म
फिर उसी नारी को
अलग थलग तुम कर आते हो
दिन बीते जैसे ही चार, पाँच
फिर उसी नारी के हाथों का
तुम क़्यों खाते हो

तन नहीं होता मल
सोच मल होती है
है भरतवंशीयो
तुम्हारी इन हालतों पर
आज इस “बिष्ट “की कलम रोती है

विज्ञान मानोगे
ज्ञान मिलेगा ।
अँधे बने रहोगे
अज्ञान मिलेगा ।।

22. माँ का लाल
माँ पूछे बेटा हाल कैसा है
परदेश जाकर मेरा लाल कैसा है ?

क्या बताऊँ माँ —
सुखी यह रोटी चबाई नही जाती
गर्म वो फूली रोटी
तेरे हाथ की बनी
भुलाई नहीं जाती

रोज नित्य के वही
ऑफिस, कारखाने हैं
बंद पिंजरे मैं कैद यहां जिंदगी
उड़े हो गए अब मुझे
वो बीते जमाने हैं

भटकता रहता हूँ यहां दिनभर
रिश्तो पर पैसों का मायाजाल है
मत पूछ मेरी माँ
किराए की जिंदगी मैं
जी रहा तेरा यहां लाल है

पहचान तुझे अपनी मैं
अब माँ यहां क्या बताऊं
परदेशी या फिर एक किराएदार हूँ
जब से छुटा तेरा साथ
तब से यहां सभी से अंजान हूँ

बोली भाषा मेरी
यहां कोई जानता नही
शहरी ही शहरी को
यहां पहचानता नहीं

बिछड़कर, छूटकर माँ गांव से
यहां आजीवन वनवास हो गया
तंग कमरों मैं यहां जीना बेहाल हो गया

माँ तुमको क्या मैं रोज याद आता हूँ
बिन तेरी गोदी
अब मैं यूं ही सो जाता हूँ

मत पूछ माँ क्या हाल हो गया
तेरा लाल यहां बेहाल हो गया ।।
23. एक प्यार ऐसा भी
एक प्यार ऐसा भी
बैठी थी सड़क के चौराहे पर
ओढ़े शॉल इस दिसम्बर की ठंडक मैं,
संग था उसके
कोई उसका प्रियतम, या कोई साथी
लड़ रही थी वह
लाचार होकर अपने शरीर से
व जीवन की इन कठिनाइयों से,
फूंक फूंक कर पिलाई चाय
उसने अपने हाथों से
बहा ना वो ह्रदय मैं पनपे
अपने इन कमजोर जज़्बातों से,
था जमावड़ा इर्दगिर्द
जैसे मेले मैं लगा कोई तमाशा,
अश्रु बह रहे उसके, मन व्याकुल था
प्रश्नों के उसके उत्तर देने को
कौन कहाँ इतना काबिल था
24. चाय की दुकान
पी आता हूँ
कुछ गम
कुछ खुशिया
कह, सुन आता हूँ
कुछ अपनी
कुछ उनकी,
उड़ रही जिंदगी
चाय के
भाप की तरह
हमें है भ्रम
हम जी रहे हैं,
सुलगते, दहकते जज़्बात
कचोट रहें है मन को
तल पे सत्य छुपा है
ऊपर कप की
प्याली मैं जैसे
झूठ हिलोरें मार रहा है,
फूंक, फूंक कर
पढ़ रहा है चलना
डर हैं कहीं
जीवन यह अपना कर्तव्य
भूल ना जाए,
रोज के नए किस्से है
कुछ तेरे
कुछ मेरे
हिस्से हैं ।।
25. तलाश गुमशुदा की
तलाश गुमशुदा की –
आकृति उसकी
कुछ मुझ जैसी
कुछ तुझ जैसी
कारण – कोई प्रेम नहीं
मानसिक रोग नहीं ।

तलाश गुमशुदा की –
हालात अपने देख घबराया
या वहम का किसी ने वीज बोया
बैठा होगा –
किसी फूटपाथ
या सोया होगा
या जमीर अपना खोकर रोया होगा ।

तलाश गुमशुदा की –
छपाए होंगे पोस्टर
या इश्तिहार दिया होगा
घुट दर्द का –
उस परिवार ने भी
तो पिया होगा
हो रही होगी बाते
दो चार कानाफूसी
वही सब की सोच दकियानूसी

तलाश गुमशुदा की –
देख जमाने को
कुछ सीखा होगा
या बन बुत –
स्वयं का भार
ढो रहा होगा
तलाश गुमशुदा की ?
26. ताज या कोई राज
ताज प्रतीक प्रेम का
या लहूलुहान काटे गए हाथों से
बना एक मकबरा
संगमरमर का,
यह निशानी कैसी प्रेम की
जिसने छीनी जिंदगीया
उजाड़े घर
काश्तकारों के,
वह शासक प्रजा का
या क्रूर शनकी प्रेम मैं डूबा
अंधभक्त एक राजा,
महल वह सुंदरता का
या चीखों, बदुआओ से
बना सफेद सिर्फ पत्थर
वह ताज या कोई राज ?
27. रीत
यह किसने रीत बनाई
पिया का घर बने अपना
बाबुल के घर से हूई बिदाई
छोड़कर रिश्ते, उम्र तिहाई,
यादें को लिए दामन मैं
फिर प्रियतम सँग
नई दुनिया,
नए रिश्तों की नाव चलाई
यह किसने रीत बनाई ।।
देकर नाम सोलह श्रृंगार
किए अंकित चिन्ह
जमाने ने मुझ में
कहीं पर सिंदूर
कहीं पर चूड़ियां
माथे पर पिया नाम की बिंदिया लगाई
यह किसने रीत बनाई ।।
छोड़ कर बाबुल की
दी हुई पहचान मेरी
पिया के नाम की
ही मोहर लगाई
यह किसने रीत बनाई ।।
28. एक नदी गगास
ए नदी गगास –
कहाँ तुम हूऐ जा रही हो लुप्त
कहाँ गए वो तुझ पर नाज करने वाले
कहाँ गए वो तेरे ठेकेदार
कहाँ गए वो तेरे जन, जन
जो देते थे दुहाई,
अपनी आजिविका की
जिन्होंने नोचा तुझे हर पल
करके कंक्रीट, तेरा पथ, पानी
खड़े किए अपने राजमहल
घोंप कर हर पल
खंजर तेरे सीने मैं,

ए नदी गगास –
तूझे उजाड़ने वाले, उजाड़ते रहे
हम बने रहे तब भी
अब भी मूक बधिर दर्शक
कहते रहे हम
अपनो को देव भूमि
पर निभाया क्या हमने
माँ कहलाने वाली नदियों
की यह हालात देख कर,

ए नदी गगास-
कभी तुम बहती थी
कल कल वेग से
सींचती थी हमारे हरे, भरे
लहलाते खेतों को
भरती थी अन्न के भंडारों को
तेरे ही अँचल मैं तो
खेल कुदकर हूऐ थे बड़े,

ए नदी गगास-
तू ही तो है प्राणदायिनी
इस मेरे गाँव, की
फिर हम क्यों नहीं
बन सकते वही भागीरथ
जिसने तारा जग सारा ।।
29. शरद ऋतु
देखों ऋतु शरद मैं
वो फिर काँपने लगे है
बैठे, रहते, थे बना कर घर
जो किसी पुलिया
खुले आसमान के नीचे
यह शरद ऋतु
कब उनके लिए खुशगवार बना
जली हुई थी
जो आग, गर्माहट,
बुझी वह भी
उन ओस वाली बूंदो से
चिपका कब तक
रहता वह बच्चा
अपनी माँ की गोद से
पेट की आग
जब तक ना बुझी हो
कब तक मोड़े रहते
वो पेट से उन घुटनों को
जब शरद ऋतु
हो अपने चरम पर
होता ग्रीष्म ऋतु
उत्तार फैकतें
उन फटे वस्त्रों को
पर ऋतु शरद ने
कब इन पर दया दिखाई
देखों ऋतु शरद मैं
फिर वो काँपने लगे हैं
30. तू याद आता है
तू याद आता है
माँ की खाली
हूई गोद मैं
पापा के अब
इन झूखे हूऐ कंधो मैं
तू याद आता है
बहन की एक अधुरी
रखी हुई राखी मैं ।

तू याद आता है
मेरे संग खेले हूए
हर एक खेल मैं
घर मैं रखे हुए
इन चाबी वाले खिलौनों मैं
तू याद आता है
इन लटके हुए मेडलों मैं
हमारे उन झगड़ो मैं ।।

तू याद आता है
उसके साथ निभाए
तेरे उन वादों, कसमों मैं
बेरंग पहने हुए उसके
उन सफेद वस्त्रों मैं ।

तू याद आता है
घर मैं जन्मी तेरी
उस नन्हीं बिटिया की हँसी मैं
तू याद आता है
सुबह की उस तेरी ठिठोली में
शाम के उसके इंतजारओं में ।।

तू याद आता है
इस होली मैं
दहलीज पर सजी
उस दीवाली की रंगोली मैं
तू याद आता है
कोरे कागज से हुए
उन कलाई,
हाथों की हथेलियों में ।

तू याद आता हैं
माँ के ना सूखे
हूऐ उन आंखों मैं
मेरे ना बयां
होने वाले जज्बातों में
तू याद आएगा
हमारे आने वाले कल मैं
हमारे बीते हुए पल मैं ।।
31. तुम्हारी याद आती है
ए प्रियतम
तुम्हारी याद आती है
जब जब हुई बरसात
जब जब निकला
मेरी आंखों से सैलाब
ए प्रियतम तब तब
तुम्हारी याद आती है ।
रहता हूं मैं
जब जब भी तनहा
चाहता हूं मैं
जब कुछ कहना
भटकता हूं दिनभर
रातों को ना नींद आती है
ए प्रियतम
तुम्हारी याद आती है ।।

पपीहे की धुन
कोयल का गान
तेरी मेरी वो पहली मुलाकात
मुझे याद आती हैं
ए प्रियतम
तुम्हारी याद आती है ।
वो किस्से वो कहानियां
वो गली, वो तेरा घर
हर बात मुझे
अब रुलाती है
ए प्रियतम
तुम्हारी याद आती है ।।

हम भी तन्हा
तुम भी तन्हा
तन्हा यह तुम बिन मेरा जीवन
अब अकले अकले ही
कट सी जाती है
ए प्रियतम
क्यों हो तुम रूठे
तुम्हारी याद आती है ।
32. कर्म ही पूजा है
मेरा प्रभु
मेरे पर कर्म क्यों करे ?
मेने किया ही क्या
दो वक्त की पूजा पाठ
पर दिया ही नही कुछ
चोखट पर खड़े मेरे
उस गरीब को जो करराह रहा था भूख से,
माना गया मैं मंदिर, गुरुद्वारा
चढ़ाऐ फूल, प्रसाद
पर ध्यान दिया नहीं
उस फ़क़ीर पर
जो बैठा था
मेरे आने की आश मैं,
किया हवन, किया दान
पर कि नहीं कभी मरम्मत
टाट, टूटे,फूटे, टीन, लकड़ी
के बने उन घरों की
जो रहते हैं
वहाँ की बदहाली मैं,
चढ़ते हैं चादरें, बदलतें हैं कपड़े
रोज नित्य
अपने, अपने भगवान के
पर मेरा, तेरा प्रभु
हम पर कर्म क्यों करे
जब हम
मुख फेर लेते हैं
किसी मेले, कुचले कपड़े पहनें
इंसान को देखकर,
पड़े मेने ज्ञान के सारे ग्रन्थ
पर ऐसे मोन ज्ञान का क्या
जब हमने भटके हुए
समाज के लोगों को
सही राह दिखाई ही नहीं ।।
33. गजल
आज फिर इश्क का चाव लगा है
दिल मैं फिर ये गहरा घाव लगा है
उनसे कर ली हैं
जब से बाते दो, चार
सुना है जमाने को
फिर हमारे इश्क को
सुन ने का चाव लगा है
धीरे धीरे बया हो इश्क, मोहब्बत
सुना है अब हर मोहब्बत का
बाज़ारो मैं भाव लगा है
कुछ गम तेरे कुछ गम मेरे
कुछ हसरतें तेरी कुछ हसरतें मेरी
इन्हीं को पाने का
जीवन भर का दांव लगा है
आज फिर इश्क का चाव लगा है
गुजरूं जो तेरी गली से
तेरी गली मैं महफ़िल
अपना घर अब ये
सुनसान लगा है
आज फिर इश्क का चाव लगा है
34. कोई अपना सा हो
कोई अपना सा हो
धूप मैं छांव जैसा
रातों मैं सपनों जैसा
प्रश्नों मैं हल जैसा
आँखों मैं काजल जैसा
हँसी मैं अपने जैसा
दुःख मैं संग साथी जैसा
कोई अपना सा हो
बाँसुरी मैं कान्हा जैसा
नाव मैं मल्हार जैसा
मित्र मैं कृष्णा जैसा
ॐ मैं शिव जैसा
प्यार मैं मजनू जैसा
साथ मैं हीर जैसा
कोई अपना सा हो
हवा मैं छुवन जैसा
जल मैं मछली जैसा
वाणी मैं सुर जैसा
गीत मैं कोयल जैसा
खेल मैं बच्चों जैसा
ममता मैं माँ जैसा
कोई अपना सा हो
उजाले मैं सूरज जैसा
रातों मैं चाँद जैसा
वचन मैं राम जैसा
दीए मैं तेल जैसा
शरीर का आत्मा मैं मेल जैसा
कोई अपना सा हो
पर्वतों पर पिघला बर्फ जैसा
फूलों मैं बैठा भंवरा जैसा
पत्तों में सरसराहट जैसा
चिड़ियों की चहचहाट जैसा
गागर मैं सागर जैसा
रंगों मैं निले आसमाँ जैसा
कोई अपना सा हो
माँ के आँचल की छाँव जैसा
दुल्हन के श्रंगार जैसा
हाथों में सजी मेहंदी जैसा
वचनों मैं
सातों वचनों जैसा
धागों मैं पिरोया हार जैसा
लिपटा हुआ गले मैं हार जैसा
कवि की सूंदर सोच जैसा
धरती पर उगी हूई
लहलहाती फसलों जैसा
खेतों मैं किसान जैसा
घर में आया
नन्हा मेहमान जैसा
कोई अपना सा हो
मुझ मैं तुम जैसा
तुम मैं मुझ जैसा ।।
35. प्रकति
ऐ प्रकति
क्यों हो तुम रूठी हूई
पहले तो बहती थी
निश्छल वेग मैं
अब यह सैलाब
कहाँ से लाई हो
कहाँ गई तुम्हारी
वो निर्मल पत्तों की हवा
अब रुदन क्यों
तुम्हारा यह पत्तों का शोर

ऐ प्रकति
क्यों हो तुम रूठी हूई
उतारे तुमनें क्यों
ये अपने
सफेद हिम के चादरे
कहाँ गए
वो तेरे हरे मखमली आँगन
अब दीखती हो
जैसे कोई हो
विधवा अभागन
कहाँ गए वो तेरे
रंग, बिरंगे, फूल
वो पंछी, वो चहचहाहट
अब दीखता क्यों नहीं
वह आसमानी इंद्रधनुष
ऐ प्रकति
क्यों हो तुम रूठी हूई
36. देव भूमि लिखूँ या पलायन भूमि
खेतों की इस,
बंजर भूमि को पलायन लिखूँ
या उजड़ते हूऐ रिश्तों, घरों
के इन आँगनो को पलायन लिखूँ
अपनी खुदगर्जी को पलायन लिखूँ
या सरकार की इन,
कागजी विकाशों को पलायन लिखूँ
इस ” देव ” धरा की हो रही
दुर्दशा को पलायन लिखूँ
या यहाँ की अब्यवस्था
को पलायन लिखूँ
मिलों ढो रहे,
इन कंधो के बोझों को पलायन लिखूँ
या वीरान शिक्षा की इन
जगहों को पलायन लिखूँ
सुविधाओं का आभाव के इन
शब्दों को पलायन लिखूँ
या इन शहरों की,
चकाचौंध को पलायन लिखूँ
परिवार की आकांक्षाओं को पलायन लिखूँ
बदलता हूआ यह समय,
या बदलती हूई
हमारी सोच को पलायन लिखूँ
गिरती हूई इन,
दीवारों को पलायन लिखूँ
या जिस घर ने हमें बनाया
अब उस खंडर घर को
पलायन लिखूँ
द्वरवाजों, पर लगे इन
तालों को पलायन लिखूँ
या ” पटाण ” मैं उपजे हूए,
अब इस हरी घास, को पलायन लिखूँ
मंदिरो, देवी थानों, रास्तों, के इन
सुनसान आवाजो को पलायन लिखूँ
या बूझे इन थानों के
“दीए ” को पलायन लिखूँ
अपनी बेबसी को पलायन लिखूँ
या अपनी कमियों,
खुदगर्जी को पलायन लिखूँ

ऐ खुदगर्ज बिष्ट,
अब तू ही बता
तेरी इस भूमि को
देवभूमि लिखूँ
या पलायन की भूमि लिखूँ ?
37. राजनीती
मेरे भारत का
हाल बेहाल है
जिन्होंने लूटा देश
वो घूम रहे विदेश
जिन्होंने लूटी रोटी
वो झेल रहे
जेल की कोठी

लोगों का मन मस्तिष्क
सो गया कोमा मैं
कोई बंद होकर
निकले जो जेल से
करोड़ों कमा जाते
मेरे भारत मैं
अब भी भूखें कई लोग
सड़कों पे ही सो जाते

जो देते हैं दुहाई देश की
वो हैं बड़े ही जादूगर
देख मोके पर
चौका मार जाते
देश क्या, जमीर भी
अपना बेच जाते

हर दिन हो रहा
नया भ्रष्टाचार उजागर
फिर देश आँखे मुद्दे हैं
कोई बैठा पब मैं
कोई मयखानों में झूमे है

हो रही राजनिति
हर एक पहलू पे
कोई बैठा धर्म पे
कोई करे पेट्रोल की
अब रंगोली है

बैठे है हर कदम पर
कानून के ठेकेदार
कोई खा के चारा निगल गए
कोई पैसे के बल पे
हाथों से फिसल गए

संसद के गलियारों मैं
कुर्सियां भी अब टूट जाती
अब कहाँ वह वन्दे
अब कहाँ वह मातरम
तू, तू, मैं, मैं,
गलियों की बौछार
भी यहाँ हो जाती

सोया देश, सोया समाज
अब क्रंति आए कहाँ
भेड़ चाल जब बन बैठे मानव
फिर कोई जाए कहाँ

वादों की सरकार मुकर गई
जो बन बैठे है पपु
उनकी जुबां
हर रंगमंच मैं फिसल गई

ठहाकों का दौड़ है
हास्यास्पद हर कोई हो गया
कोई तल रहा पकोड़ी
कोई लग के गले
इशारे अपने ब्या कर गया

ऐ बिष्ट -क्या करूँ
कलम आज जज्बाती हो गई
देश की स्वच्छ राजनीति कहीं अब खो गई
कहता हूं वन्दे कहता हूं मातरम
लोगों को यह उपहास सा लगता है
इस तिरंगे पर सर झुकाना
लोगों को अब अपना अपमान सा लगता है ।।
38. क्या में तुम्हें याद आऊँगा
क्या में तुम्हें याद आऊँगा
वो आँगन की तेरी, मेरी
उस दहलीज पर
संग बिताए हुए
समय के हर उस क्षण में,

कितनी खामोश थी वो रातें
जुगनुओं का था तब पहरा
उन बातों में,उन रातों में, उन पहरों में
क्या में तुम्हें याद आऊँगा,
उस हँसी की ठिठोली में
उस हर एक
त्योहारों की रंगोली में
संग देखे, बुने हूऐ उन सपनों की
व अतीत की झोली में
क्या में तुम्हें याद आऊँगा,

भीगी हूई बारिशों की उन बूदों में
तेरी मेरी, हर उन मुलाकातों में
ऐ प्रियतम -क्या में तुम्हें याद आऊंगा,

बीते हुए दिनों के
हर उस पहर में
डूबे, उगे, हुए
सूरज की हर उस लालिमा में
क्या में तुम्हें याद आऊंगा
तुम्हारे आज में
तुम्हारे आने वाले कल में ।
39. उफ
उफ ये
मिलकर बिछड़ना
बिछड़कर मिलना
जज्बात फिर भी
तो रहे अधूरे
मैं कहूँ कैसे
तुम सुनोगे कैसे,
उफ ये भर्म
इस जग के
छूटेंगे कैसे
टूटेंगे कैसे,
उफ ये
कैसा शर्माना
उन्होंने कहा
मेनें सुना नही
मेनें कहना चाहा
पर कहा नहीं,
उफ ये
मेरी, उनकी खामोशी
कहीं सदिया ना
बीता ले जाएँ
हम कहें नहीं
वो समझें नहीं,
उफ ये
इश्क का घाव
बड़ा नासूर
भरता नही
जाता नही ।।
40. पहाड़ों की यात्रा
चलो आवो तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं,
कभी नैनीताल, तो कभी रानीखेत, ले जाऊं
इन पहाड़ों की वादियों की सैर कराऊं,
चलो आवौ तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं

देव भूमि नाम है इसका,
अपने पहाड़ों से तुम्हें परिचित कराऊं,
कभी गढ़वाल,तो कभी कुमाऊ,ले जाऊं
चलो आओ तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं

गंगा, यमुना, गंगोत्री, के तुम्हें दर्शन कराऊं,
हरिद्वार,हिमालय,तीर्थ स्थल तुम्हें मैं लै जाऊं
चलो आओ तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं

टिहरी बाँध, चिपको आंदोलन,की कथा तुम्हें सुनाऊं,
त्यौहार हरेला का,और नंदा देवी मेले के बारे में बताऊं
चलो आओ तुम्हे अपना पहाड़ घुमाऊं

मडुवे की रोटी, बाल मिठाई तुम्हें अल्मोड़े की खिलाऊं,
ढोल, दमुआ, बीन बाजा तुम्हें बजाना सिखाऊं
चलो आओ तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं

गोपाल बाबू गोस्वामी,
राजा मालूशाही के गीत, तुम्हें सुनाऊं,
गोलू की भूमि,
कत्यूरों के जागर के बारे में तुम्हें बताऊं
चलौ आओ तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं

पहाड़ी,गढ़वाली,भाषा का तुम्हें ज्ञान कराऊं,
चीड़, देवदार,बुरांस कै फायदे तुम्हें बताऊं
आओ तुम्हें अपना पहाड़ अपना गांव घुमाऊं
41. तुम ओर मैं
मैं भी कवि
तुम भी कवि
फर्क इतना
मैं लिख लेता हूं
तुम पड़ लेते हो ।
तुम बिन
भाव मेरे अधूरे
फर्क इतना
मैं शब्द
तुम इनकी बोली ।
हम दोनों
प्यार के राही
फर्क इतना
मैं सुन लेता हूं
तुम कह देते हो ।
तुम बिन शब्द
बेजान मेरे
फर्क इतना
मैं कलम
तुम इनकी स्याही ।
मेनें कब माना
तुमको कोई कल्पना
फर्क इतना
तुम मेरी
उपजीत सोच
तुम ढली
इसमें एक सुंदरता ।
मैं भी कवि
तुम भी कवि
फर्क इतना
तुम बिन
मैं अधूरा
मेरे बिन
तुम अधूरे ।
42. गीत कौन सा गाऊँ मैं
गीत कौन सा गाऊँ मैं
गीत कौन सा गुनगुनाऊँ मैं
इस पतझड के मौसम मैं
सावन की बेला कहाँ से लाऊँ मैं
गीत कौन सा गाऊँ मैं
गीत कोन सा गुनगुनाऊँ मैं ।

रूठा मुझसे यह बसन्त
रूठा आज मेरा मनमीत है
टूटे, छुटे, इस जग के
यह बँधन सारे,
किस गली, किस शहर
किस घर, अब जाऊँ मैं
गीत कौन सा गाऊँ मैं
गीत कोन सा गुनगुनाऊँ मैं ।

अक्स बिन, उनका देखे
नींद आती नही,
तन्हाई जाती नही,
इन आँखों मैं अब
स्वपन किसका सजाऊ मैं
गीत कौन सा गाऊँ मैं
गीत कोन सा गुनगुनाऊँ मैं ।

भ्रम थे जो प्यार के, मैने पाले
वो टूट चुके, बिखर चुके
इस ह्रदय मैं अब,
यादें किसकी सजाऊँ मैं
गीत कौन सा गाऊँ मैं
गीत कोन सा गुनगुनाऊँ मैं ।

ऐ- इश्क आज तू भी हो गया बड़ा निर्लज्ज
हम कहते नहीं, वो सुनते नहीं,
पैगाम-ए-मोहब्बत, अब किसको बतलाऊं में
गीत कौन सा गाऊँ मैं
गीत कोन सा गुनगुनाऊँ मैं ।।
43. जमीन
हर किसी को हक़ है
ऊँचा उड़ने की
ऊँचा उड़े पर अपनी
जमीन मैं रहकर ।

कई किस्से, कई कहानियां
खो जाती है, गिर जाती हैं
अपने अहम मैं रहकर
ऊँचा उड़े पर अपनी
जमीन मैं रहकर ।।

खवाब देखो, उड़ाने भरो
ऊँचा उड़ने की,
पर बुनो जाल
सच्चाई, लग्न का,

आदर्शो की गाँठ की पोटली
मिलती नही किसी भी
शाखाओं, राहों पर,
ऊँचा उड़े पर
अपनी जमीन मैं रहकर ।

झूलसो, बनो कुन्दन
जेठ की गर्मी मैं
ऊँचा उड़े पर
अपनी जमीन मैं रहकर ।।
44. मौत
ऐ मौत मुझे है पता
एक दिन आएगी तू
किन्ही को खुश,
किन्ही को बहुत रुलाएगी तू

तोड़ के इन,
जमाने भर की जंजीरों को
मेरे घर का पता भी ढूढ लाएगी तू
ऐ मौत मुझे है पता
एक दिन आएगी तू

हूँ जब तक जिंदा
लड़ुगा, गिरूंगा
तेरे इन तूफानों से
वीर सपूत हूं मैं भी सच्चा
मेरे इस भारत का
फिर उठ खड़ा होऊंगा
इन लहुलाहते कदमों से
देखूँ मैं भी,
कब, कब मेरा
रास्ता रोक पाएगी तू

सिला रखा है
मैंने भी कफ़न
तेरी, मेरी उस मुलाकात का
रखता हूं मैं भी हिसाब
अपनी हर,
हार, जीत का

ऐ मौत
जब तू ले मुझे
अपनी आगोश मैं
कोई मलाल ना रहे तुझे
मेरी किसी भी बात का
ऐ मौत मुझे है पता
एक दिन आएगी तू

धड़कूँगा हर बार
फिर मैं
इस धरा के लिए
ऐ मौत मुझसे
कहाँ जीत पाएगी तू ।।
45. जश्न ए आज़ादी
आओ ऐसा एक भारत बनाएं
लक्ष्मी बाई, मंगल पांडे,
सुभाष, आज़ाद, भगतसिंह,
इन्हें अपने जीवन का आदर्श बनाएं
देखा था जो सपना
इन आजादी के वीरों ने
आओ ऐसा एक स्वर्णिम भारत बनाएं ।

क्या गोरा, क्या काला
कोन ऊँच, कौन नीच
क्या हिन्दू, क्या शिख, क्या मुस्लिम
ज्ञान, सदभाव का
अन्तर्मन मैं एक दीपक जलाएं
आओ ऐसा एक भारत बनाएं ।।

चल,चलें साथ लेकर
पीछे छुटे हाथो को
हिम् से, सागर तक
पूरब से, पश्चिम तक
विकसित एक भारत राष्ट्र बनाएं
आओ ऐसा एक भारत बनाएं ।

राम, रहीम, नानक, कृष्ण,
अल्लाह, गौतम, यीशु,
की बनाई इस दुनियां मैं
घर, घर, गांव, गांव, शहर, शहर,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च,
शांति का एक दीप जलाए
आओ ऐसा एक भारत बनाएं ।।

रखे जो कोई नापाक कदम
इस भारत भूमि पर
उन्हें उखाड़, खदेड़,
धूल मैं मिलाए
आओ मिलकर इस तिरंगे की
आन, शान, बान, बढ़ाए
आओ ऐसा एक भारत बनाएं ।

मंन रहा यह जो जश्न आजदी का
उन वीरों का बलिदान ब्यर्थ ना जाए
आओ मिलकर ऐसा एक भारत बनाएं ।।
46. याद आयी है
आज याद फिर तुम्हारी आयी है
जब जब बैठा कोई भवँरा इन फूलों पे
इन फूलों ने तब, तब तुम्हारी ही
गजरे की महक चुराई है
सोते हुए मुझे, इस पुरवैया ने
तेरे ही आने की दस्तक
मेरी चोखट पर मुझे सुनाई है
आज याद फिर तुम्हारी आयी है ।

कितना खूब कितना सुंदर
आज लग रहा यह चाँद
काली घटा से
निकलकर जैसे आया है
देखूँ इसमें, मैं तुम्हारा ही अक्स
बन चाँद याद तुमने मुझे अपनी दिलायी है
आज याद फिर तुम्हारी आयी है ।।

ये काजल जैसी राते
लिपट जाती हैं मुझसे
हों जैसे कोई तेरे केशों के लम्बे बाल
तब खो जाता हूं, बह जाता हूं
कटती नहीं तब ये लम्बी रात
पढ़कर तेरा पत्र, रखा जो सिराने पर
रात हमनें तब तब गुजारी है
आज याद फिर तेरी आयी है ।

कहूं किस से अपने दिल की बाते
वक्त ने ये दूरी बनाई है
ऐ- प्रियतम, तुम भी समझ लेना
हिचकी बन बन –
याद मेने तुम्हें अपनी दिलायी है
आज याद फिर तुम्हारी आयी है ।।
47. खुशियों का घर
खुशियों का घर इस शहर मैं –
मैं बनाऊँ कैसे
खुद को महसूस करता हूं
एक अपराधी जैसा
नेकी का जब मैने कमाया ही नहीं
नेकी कर मैंने जब
दरिया मैं डाला ही नही
छोड़ आया जब मैं
अपनों परिजनों को रोते बिलखते हूऐ
उनकी महत्वकांछाओ को
जब मैने पूरा किया ही नही
जो शहर कभी सोता ही नहीं
इन आँखों मैं फिर
सपना किसका सजाऊ
हर कोई तो यहाँ
लालच भारी आँखों से देख रहा
गुरूर यहाँ सबको खुद पे
लड़ रहे भीड़ रहे
हर गली मोहल्ले के चोराहे पर
यहाँ इंसान खुद ही,
कभी जब देखा ही नहीं
कटे फटे, मैलो वस्त्र पहने इंसानो की ओर
खुद ही तो श्रंगार किया अपना ही
मजहबों के दीवारों मैं
जब खुद ही, है बटा हूआ
ग्लानि, शर्मिन्दगी नहीं होती आँखों मैं
आँचल किसी का छीनते हूऐ
फिर खुशियों का घर
इस शहर मैं,
मैं बनाऊँ कैसे ?
48. जिंदगी
धूप-छांव भरी यह जिंदगी
रचती नित्य दिन यह खेल निराले
कोई बेबस खुद से ही
किन्ही के हाथों में रोज मधु भरे प्याले

चल रहे हैं जी रहे हैं
इंसान यहां खुद से ही लड़कर
कोई खुश अपनों की ही बातों से
कोई मोहताज यहां दो वक्त के निवालों से

है बड़ी कशमकश –
ऐ जिंदगी तेरी इस बे – दौड़ की
कभी तू हमसे खफा
कभी उलझी ही रह जाती यह जिंदगी
तेरे इन अनगिनत सवालों से ।।
49. सावन आया है
आओ खुशी से नाचे गाये
क्योंकि फिर सावन आया है
धो लो अपने सब मन के वहम
क्योंकि फिर सावन आया है
लेकर प्रीत संग बादल की
फिर यह बरसने आया है
नाचो गाओ –
क्योंकि फिर सावन आया है
चल रही, ठंडी पुरवैया
झूम रहे खेत खलियान उमंग होकर
क्योंकि फिर सावन आया है
बूदें हैं ये पानी की
या इनसे कोई मोती गिर रहे
खुश है आज बच्चा – बच्चा
देकर आज फिर ये नई सौगात
क्योंकि फिर सावन आया है
क्या शहर क्या गाँव
गरज रहे, बरस रहे
बनकर मेघदूत ये बादल
झूमो नाचो गाओं
क्योंकि फिर सावन आया है
छेडी इन पंछियो ने
यह कैसी तान
देखो कोई प्रियतम, कोई मल्हार
फिर कुछ कहने आया है
नाचो गाओ –
क्योंकि फिर सावन आया है
50. अजब लिखते हो
अजब लिखते हो
गजब लिखते हो
आँसुओ को तुम मेरे
दरिया का पानी लिखते हो
तेरी मेरी उस —
शाम, की पहली मुलाकात को
जीवन से जुड़ी –
तुम एक, नई कहानी लिखते हो
अजब लिखते —-

नाचूँ मैं भी वन,वन होकर वैराग्य
जैसे कोई सावन का मोर
खोई सुध बुध,मेनें तेरे ही लिए
तेरी रूह, मेरी यह रूह
अब कहाँ यह अलग – अलग
इन दो दिलों की धड़कनो को
अब तुम एक दिल
एक जान लिखते हो
अजब लिखते —

करके श्रंगार –
जो रखे मैंने दहलीज पर तुम्हारे कदम
मेरे उस आगमन को तुम
आया है जीवन मैं हमारे
महेमान लिखते हो
अजब लिखते —

कब तक रहे खामोश अब ये लब मेरे
मन मैं तुम,तन मैं तुम
हर पहर मैं अब मेरे तुम, ही तुम रहते हो
अजब लिखते हो–

सुन मेरे ओ दिलबरा
ना कहूँ मैं तुझे कोई ताज
ना कोई पूनम का चाँद
तुम हो,मैं हूँ, मैं हूँ,तुम हो
यही इस जीवन मैं काफी है
अजब लिखते हो
गजब लिखते हो ।।
51. ऐ पहाड़ – मैन तुझे दिया ही क्या
ऐ पहाड़ –
मैंने तुझे दिया ही क्या ?
वह पलायन का दर्द
हरे भरे खेतों की वह
अब बंजर भूमि
वह बूढ़ी आंखों में जागती एक आशा

मैंने ही तो किया वीरान
वह तेरा हरा भरा आंगन
खेतों की वह मुँडेर पर
अब कहाँ वह कोलाहल
आम की डाली पर
अब कहाँ वह घु घु ति
मैंने ही तो बंद किये
तेरे वह महकते आँगन
अब कहाँ वह
दिए कि रौशनी तेरे कुल मंदिर मैं

देखों मैं भी तो बन गया हूं
अब एक पर्यटक
तेरे सुख दुःख
तेरे त्योहारों का
मैं अब कहाँ संग साथी

ऐ पहाड़ –
मैन तुझे दिया ही क्या ?
52. थकना कैसा, रुकना कैसा
थकना कैसा, रुकना कैसा
जब पथ भरा हो शूल से
रोके जब ये हवाए तुम्हारा पथ
मन हर्दय जब तुम्हारा हो जाये ब्याकुल
कदम होने लगे जब
तुम्हारे पथ विपरीत
सुनाई देने लगे जब तुम्हें
यहाँ चीखना, चिल्लाना
साँसे जब तुम्हारी लगे हाँफने
ना चल सको जब तुम
इस वक्त की रफ्तार से
कर लेना याद तब तुम
वह बूढ़ी आँखे
अपना वह बिता हुआ बुरा अतीत
देख लेना एक नजर
उस ऊँचे सीना ताने शिखर को
जो भरा पड़ा है
काँटों के बीच की हरियाली से
उन उबड़ – खाबड़
कंक्रीट के रास्तो को
जो हो जाते हैं
शिखर पर पहूँचकर एक

फिर रुकना कैसा
थकना कैसा
जब पथ भरा हो शूल से
53. मानव
हां मैं हूं हाड मांस का पुतला
पर मुझ में है भावनाएं अंगिनत
खुश होता हूं –
दूसरों को खुश देखकर
दुखी होता हूं –
दूसरों को दुखी देखकर

माना मुझ में है सत्य की कमी
पर कभी मैंने अपना जमीर नहीं बेचा
धन पराया देख
कभी मैंने अपने ख्वाब नहीं बदले
तन पराया देख
कभी मैंने अपने मन नहीं बदले

खुश हूं अपनी बसाई दुनिया में
औरो के घर की चार दिवारी में
कभी हस्तक्षेप नहीं किया
हूं किसी की नजर में अच्छा
हूं किसी की नजर में बुरा

रहता हूं इस समाज में
इसलिए तर्क-वितर्क भी करता हूं
और आप ?
54. चिट्ठियां
वह चिट्ठियां तुम्हारी
अब भी मुझे आती है याद
वह दिन, पहर,महीने भर
डाकिए का इंतजार ।

वह उकेरना चिट्ठी में
तुम्हारे अपने जज्बात
वह लिखना तारीख अपने मिलन की
उन चिट्ठियों में कहना
अपने दिल की बात ।

शर्माना तुम्हारा
उन हृदय स्पर्शी शब्दों में
इजहार तुम्हारा रखकर
बंद लिफाफे में वह लाल गुलाब ।

लिए हाथ में वह
नीली स्याही की कलम दवात
शब्द पहला वह उन चिट्ठियों का मेरी प्यारी
वह चिट्ठियां तुम्हारी अब भी मुझे आती है याद ।।

वह दौर भी चिट्ठियों का अजब था
अल्फाजों की स्याही में डूबी हुई कलम
इजहार-ए-मोहब्बत की निशानी में
रखा हुआ लाल गुलाब था ।
55. आजादी
मौन वाणी कब कहां
इंकलाब लाती है
कलम उठे जब सत्य की
तभी आजादी कहलाती है ।

सलाखों के पीछे बंद होकर
कब किसने कहा जंग जीती है
मिले हैं जब कंधों से कंधे
तभी आजादी की सुगंध आती है ।

निहत्थे हाथों ने
हमेशा गुलामी ही दी है
ऊठै जो हाथ युद्ध के लिए
वो ही वीर बलिदानी कहलाए हैं ।

क्या रखा है इन मैंखानो मैं यारों
नशा नाच गाना
सब खेल इस जवानी का
कभी मिले जो फुर्सत तो देख लेना
आजादी की इस जमी को
जो इतनी मुश्किलों से हमने पाई है ।
56. अजब, गजब
अजब गजब इस दुनिया के निशान देखें
हर गली हर चौक चौराहे पर
अलग-अलग भगवान देखें
कोई कहै अल्लाह कोई कहै राम
कहीं गुरुवाणी कहीं जलते हुए
मोमबत्तियों के निशान देखे ।

अजब गजब खेल इस दुनिया का
मन के भीतर बैठे ना जाने कितने रावण
फिर भी मुंह मैं जपते सब राम देखें
फूलों कम्बलों हारौ सोने से सजे यहां भगवान देखें
हे ईश्वर एक –
फिर भी धर्म के नाम पर बटते इंसान देखें ।

बना दिए बिल्डिंग मंजिलें जिन्होंने हजारों
अब भी उनके हाथों में छालों के निशान देखें
ओड़े जो मुखोटा धर्म का
एसो को पूजते इंसान देखें
कैसी यह विडंबना इस धरती की
सरहदो पर इंसान से ही गोली खाते जवान देखें ।

करे जो छलावा उनके सोने के मकान देखें
धरा के जो है मालिक
उनके पानी से टपक ते हुए मकान देखें
अनेकों मरते यहां हमनें भी किसान देखें ।

कैसी है मेरी मालिक तेरी माया
अजब गजब इस जहां पर
तेरे नाम को बाटते
इंसान के रूप में हैवान देखें ।
57. बेटियां
घर – घर की रौनक
बहार होती है बेटियां
बनकर रूप लक्ष्मी
सिंह पर भी सवार
होती है बेटियां

बनकर पापा की परी
मां की मददगार
होती है बेटियां
सर्वगुण संपन्न ज्ञान की भंडार
होती है बेटियां

इन्हीं से सजे
घरों के त्यौहारों की रंगोली
बन जीवन संग साथी
इस धरा की बुनियाद
होती है बेटियां

ना समझो तुम इसको दुर्बल
रुप इसके अनगिनत
हर रूप मददगार
होती है बेटियां

यह नहीं सीमित
अब चूल्हे – चौकी तक
सोच, परम्पराऐ रुढ़ीवादी मानव की
बदल रही हैं बेटियां

घर – घर की रौनक
बहार होती है बेटियां ।।
58. ऐ खुशी, मेरे घर भी आया कर
ऐ खुशी –
कभी मेरी दहलीज पर भी आया कर
कब तक दौड़ेगी,
मेरी जिंदगी यह बेरंग
कभी संग बन मेरी परछाई चलाकर

मुझसे ऐसा क्या तेरा
बैर वाला रिश्ता – नाता
कभी बन के जाड़ों वाली धूप
मेरे हिस्से भी आया कर

लग रहें हों जब जीवन में
दुख के मेले
तब धीरज मूझे तू बधाया कर
बन कर सावन वाली बारिश
मेरे घर भी बरष जाया कर
ऐ खुशी –
कभी मेरे हिस्से भी आया कर

ऐ मेरे मालिक –
बड़ी गमगीन व बेरंग हैं
तेरी बनाई इस दुनिया के रंग
पग-पग छल और कपट
लिए चलते हैं
मानव जहां संग

ऐ खुशी छोड़ ऊंचे – ऊंचे महल
कभी इस गरीब की झोपड़ी में भी
डेरा अपना बसाया कर
ऐ खुशी –
कभी मेरी दहलीज पर भी आ जाया कर ।।
59. है नारी तुम महान
है नारी तुम महान,
त्याग की तुम मूरत,
धन नही, वैभव नहीं,
तुम्हें चाहिए सम्मान,

धैर्य, संयम कि,
तुम परिभाषा,
उपजित शब्द,
तुम सै हि बलिदान,
है नारी तुम महान,

खुदा की बनाई,
तुम जादूगरी,
तुम ही ग्रहणी,
तुम ही रूप ममता,

तुम ही जीवन संग साथी,
रूप तुम्हारे अनगिनत,
मानव जाति कि,
तुम ही पहचान,
है नारी तुम महान,

तुम पर ही नियम लागू,
ईस प्रकृति,
घर, संसार कै,
तुम बिन व्यर्थ,
फिर भि यह जहान,

कैसे करूं,
तुम्हें परिभाषित,
तुमसे ही प्रारंभ,
नीव ईश जग की,

तुम ही कुल,
तुम ही मर्यादा,
तुमसे ही उपजित,
वेदों का ज्ञान,
है नारी तुम महान !!
तुम् महान, तुम् महान, तुम् महान ।।
60. आज फिर वह मुझसे मिलने आई है
आज फिर वह
मुझसे मिलने आई है
कुछ मेरी कुछ अपनी
कहने सुनने आई है

शायद दिल में उनके
रह गए होंगे
कुछ छुपे हुए जज्बात
गले मुझे लगा कर
आज फिर वह रोने आई है

आज फिर वह
मुझसे मिलने आई है ।।

इस वक्त का खेल है
ऐ बिष्ट – बड़ा अजीब
जो बैठे रहे
घमंड की चोटी पर
बढ़ती उम्र में उनको
अब ये तहजीब आई है

हम भी हो चुके हैं
अब थोड़ा निष्ठुर थोड़ा निर्दयी
हमने भी तो इस जहां में रहकर
यही रंगत – संगत पाई है

आज फिर वह
मुझसे मिलने आई है ।।

है भीड़ है कोतूहल
अब इस जनाजे में मेरे
मेरे बैरंग हो चुके
ये अश्रुओं की धारा
देखो बंद आंखें मैं
अब मेरी वह
देखने आई है

गीले शिक़वे हो
अब कैसे दूर

दुनिया जब लेकर
फूलों वाला हार
अलविदा कहने आई है

देखो आज फिर वह
मुझसे मिलने
चोखट पर मेरी आई है ।।

61. रंगोली
बनी सप्त रंगों से यह रंगोली
तेरी मेरी हम सब की
पहचान यह रंगोली
कोई लाल कोई पीली कोई नीली
कहती कुछ न कुछ,
अपनी व्यथा यह रंगोली ।

जब घर आंगन दीप जले
तब द्वार द्वार सजे यह रंगोली
कभी बन कर खुशियां
कभी मेहंदी बन दुल्हन की
विदा होती यह रंगोली ।

जब छाए पर्वतों पर काले बादल
बरसे मेघ बन उमड़ घुमड़
तब लिए धूप संग
इंद्रधनुष बने यह रंगोली ।

जब आए मोसम
रंगों के त्यौहारों का
उड़े गुलाल बनकर
काला पीला नीला
तब हर हाथ हाथ
हर गाल गाल बनकर
रंग लगे यह रंगोली ।

बिन रंग व्यर्थ जीवन
आओ घर घर
सजाएं यह रंगोली ।
62. अच्छा है
रोज देखता हूं उनको तस्वीर में
कभी वह सामने आ जाए तो अच्छा है
हर दिन गुजारे हैं उनकी गली में
कभी वह भी
हमारी गली में आ जाए तो अच्छा है
ऐ “बिष्ट ” कब तक छुपाओगे
दिल की बात दिल में
कभी दिल से दिल की बात हो जाए
तो अच्छा है
बोझिल सी यह शामें
अब कटती नहीं उनके बिना
आंगन हमारे वह आ जाए
तो अच्छा है
ऐ “आदर्श ” कल्पना यह तुम्हारी मेरी
सत्य चित्रार्थ हो जाए तो अच्छा है
रोज आते हो ख्वाबों में मेरे
कभी रूबरू मुलाकात हो जाए तो अच्छा है
कब तक यूं ही जीना
तेरे बिन शिसक शिसक कर
मेरा नाम तेरे नाम से जुड़ जाए तो अच्छा है
कब तक देखूं
अपनी आंखों से इस जमाने को
तेरा मेरा जहां भी बस जाए तो अच्छा है
आओ मिलकर करे
गिले-शिकवे दूर
मैं तुम – हम बन जाएं तो अच्छा है ।।
63. हरि ॐ
भटक रहा जीवन
बिन “हरि ” बंजर – बंजर
कोई बता दे मुझे
पता ” हरी” का
धड़क रही मेरी सांसों में
यह जो धड़कन भी
उसके नाम कर दूं ।।

ऐ हरि ” मोहे ना दिखा
जीवन के तू इतने रंग
मुझे भी रंग ले अपने रंग मैं
अपने जीवन के सारे रंग
” हरि “तेरे नाम कर दूं ।।

खोजें जैसे मृग कस्तूरी वन वन
तड़प रही बिन जल मछली
मन मेरा व्याकुल
ऐसे ही “हरि मिलन” को
कोई बता दे मुझे पता
“मोहे हरि” का
यह दौलत शोहरत
उसके नाम कर दूं ।।

हूं रहागिर –
तेरी बनी मैं इस दुनिया का
भ्रम फिर मुझे यह कैसा
यह मेरा वह तेरा का
खोया हूं सोया हूं
जग की तेरी इस निर्मित माया में ।।

कोई बता दे मुझे पता
मेरे “हरि ” का
इन हार जीत के भ्रम को
ऐ मेरे ” हरि ”
आज तेरे चरणों में नीलाम कर दूं ।।
64. पता
पता पूछ रहा
यहाँ मानव
जूआलय, शराबआलयों का
मंदिरों का पता पुछै
क्यों ना अब कोई ?

नाचे फूहड़ धनु में यहां
है कैसा लगा
यह अजब कोलाहल
“रामधुन ” में थिरके
क्यों ना अब कोई ?

मैंलेे तन को
कर ले मानव
कितना भी सुगंधित तू
मन के भीतर अपने झांके
क्यों ना अब कोई ?

है चढ़ा सर पर
कैसा यह रुतबा
शानो-शौकत का
दर पर तेरे झुका
क्यों ना कोई ?

तुम ही “कर्ता
तुम ही धर्ता ”
तुम ही ” प्रारंभ
तुम ही अंत”
इस ज्ञान को
सीखा फिर भी
क्यों ना कोई ?
65. पतझड़
ऐ मोसमें बहार
तूने भी तो देखे होंगे
मौसम पतझड़ के
हुआ तुझे क्या अहसास
जब लगे मोसम पतझड़ के ।

सुख रही थी
तेरी यह डाली
या रंग उतर गये थे
तेरे इन पत्तों के

कोई तो परिंदा
तेरे पर बैठा होगा
पंख फैलाकर
जब सुख रही थी
तेरी एक-एक पत्ती ।

सुना है मैंने भी
कोयल की कूउ, कू, कू से
पपीहे की पीहू से
गुजर रही तेरी राहों के
इन सर्द मौसमी हवाओं से
खालीपन तेरा, तेरे मन को
तब कचोटता होगा
लगे थे मोसम जब पतझड़ के

तेरी उन दिन- रातों का
तब कौन था साथी ?
जब सुख कर गिर गए थे
तेरे सारे पत्ते ।

मेरे घर के आंगन मैं भी
गिर कर आये थे – तेरी डाली के पत्ते
कुछ थे सूखे
कुछ अपने मैं ही खोये हूऐ
कुछ मोसमें ब्यथा –
कहते हुए तेरे पतझड़ के ।

सुन रे मोसम तू पतझड़
भटक ना जाना तू अपनी राह
वक्त की वही पुरानी रीत
आज मोसम पतझड़
कल ऋतु इसके विपरीत ।।
66. आजादी हमें जान से प्यारी
गूंज उठी धरती
गूंज उठा आसमान
आजादी के नारों से
विजय उदघोष हुआ-
वीर सपूतों के प्राणों से ।

दहक उठी थी जब
आज़ादी कि आग –
जन-जन कै रगो में
भारत प्यारा था
अपने प्राणों से ।

लहूलुहान हो गया रक्त
जब वीर जवानों का
देश बचाया फिर भी गद्दारों से
गूंज उठी धरती
गूंज उठा आसमान
जय हिंद के नारों से

युग था वह स्वर्णिम
देश भक्तों का
सुभाष -आजाद -भगत
टिमटिमा उठा अंबर
इन अनगिनत
आलोकित तारों से
जला गयै लौ देश भक्ति कि –
अपने प्राणौ कै बलिदानौ से !!
67. जीवन पथ
मानव जीवन पथ
जैसे एक रथ
घूमता पहिया
जैसे समय चक्र
मस्तिष्क ज्ञान
धर्म – अधर्म
का सारथी ।

बाल्यकाल अवस्था
धूप छांव का आंचल
मासूम नटखट बचपन
खेल खिलोने व सहपाठी

समय चक्र बड़ा विचत्र
युवा अवस्था
गुरुसंग ज्ञान प्राप्ति
बना जीवन आधार ।

बढ़ती उम्र
उपजीत मोह माया गुण
कभी राजा कभी रंक
मानव जीवन पथ
कब सरल
कभी काँटे कभी शूल

जब उम्र हो पचपन
तब याद आये बचपन
अँतिम पड़ाव
कौंन संग कौंन साथी
ना दूल्हा ना दुल्हन
ना कोई बराती

समय चक्र
बड़ा विचत्र
यंही जीवन
यंही मरण ।
68. आओ चल, चलें गाँव की ओर
आओ चल चलें,
अपने गांव की ओर
वह आम अमरूद
चीड़ देवदार
फ़ैले हुए आंगन
इंद्रधनुष से लिपटे हुए
उन पर्वतों की ओर
इन खेतों से भी
उग जाती हैं
चूल्हे की रोटियां
किसान कहलाने में
कोई हर्ज तो नहीं
आओ निहारे
गुच्छे में लिपटे हुए
फिर उन तारों को
देख रहा, राह
जहाँ छुपता हुआ सूरज
अब भी तुम्हारे आने की ।

ऐ प्रकृति –
मुझे भी समेट ले अपनी गोद में,
इतनी रंगत-
इस जहाँ में और कहां ।
69. छवि
छवि तुम्हारी ऐसी उकेरू में,
नैनो को दे दूं,
रूप नील, गगन का,
सौंदर्य तुम्हारा हो,
ऋतु आगमन बसंत का,
ढका आवरण जैसे,
मेघों ने इस प्रकृति का,
केशों की तुम्हारी,
हो ऐसी छाया,
मध्यम,मध्यम निर्मम, निर्मम
हवा जैसी बहती,
हो तुम्हारी काया,
कहे जग यह तुम्हें,
कोई वन हिरणी
या ग्रीष्म ऋतु की,
तुम शीतल छाया,

हैं जैसे अम्बर,धरा में,
विचरण करते हुए पंछी,
बन रहे हैं जैसे ये सप्तरंग,
ऐसी ही उकेरू,
तुम्हारी मैं छाया,

फैल हूआ है यह जो,
तुम्हारी आंखों का सफेद आवरण,
बीच घटा मैं,
यह काला बादल,
बना हुआ है,
जैसे प्रतिबिम्ब शून्य,
ऐसी ही हो तुम्हारी,
रूप, मन, निज काया !!
70. आज इतवार है
आज इतवार है,
लग रहा घर मे जैसे,
कोई मन रहा त्यौहार है,
नाच रहे भीगे, पकोड़े,
इन रंगीले तेलों मैं,
माँ का मुझ पर कैसा,
उमड़ा ये आज् प्यार है,
आज इतवार है,

आयी दरवाजे पर ये,
आने की किसकी आहट,
लिए फल, मिठाई, बिस्कुट,
खुश मन, चहेरे पर मुस्कुराहट,
आज इतवार है,
आई मेहमानों की बाहर है,

चाय, नमकीन, cold drink,
सजे थालों मैं,
सुख, दुःख, भविष्य,
के बातों की,
लगी कैसि ये,
लंबी कतार है,
लग जाते हैं,
कभी, कभी, ठहाके,
क्योंकि आज इतवार हैं,

सोचूँ मैं भी,
एक कोने मैं बैठकर,
हर किसी की किस्मत मैं,
आतै नही ऐसे क्यों,
सुख, दुःख, के इतवार हैं ?

माग रहा था,
गली मैं खड़ा एक बच्चा,
शायद उसको था पता,
मिलेगा मुझे भी कुछ,
क्योंकि आज इतवार है !!
71. नव-वर्ष, कुछ यूं मनाएं
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं,
अंधेरी राहों में,
एक उज्वलित,
दीपक जलाए,
पनप चुकी यह,
जो मन के भीतर,
अज्ञान की विचारधाराएं,
इन पर अपना,
ज्ञान रूपी विराम लगाएं,
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं,
कौन छोटा,
कौन बड़ा,
ऊँच क्या,
नीच क्या,
सब उपजित,
एक ही,
प्रकति की संतान,
तब मनुष्य वाला,
अपना कर्तव्य निभाएं,
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं,
जब दिखे तुमको,
बेबसी से अपने,
लड़ते हुए बूढ़े, बच्चे,
तब आत्म मगन,
ना हो जाना तुम,
तब हाथ अपना
मदद वाला,
आगे बढ़ाएं,
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं,
चल देते हैं हम,
रंग शालाओं में,
इस नव वर्ष,
पूजा स्थलों मैं,
जाकर जश्न मनाएं,
खड़े हो चाहे,
धरातल पर,
या शिखर पर,
मैं, अहम अपना,
त्याग कर जाएं
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं,
क्यों डूबे हम,
अंतिम छण,
व प्रथम छण,
इन मधुशालाओ में,
खड़े हैं मध्य जब,
बाईश वे द्वार के,
कुछ बेहतर करने का,
तब प्रण निभाएं,
आओ ईश नववर्ष,
मानवता का,
धर्म निभाएँ,
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं !
72. आरती शिव जी की
जय शिव,शंकर, त्रिलोक नाथी !
रुद्र,नीलकंठ,महादेव ।
अंनगिनत नाम वासी ।।
गंंण,गणेश,पार्वती ।
संग कैलाश वासी !।

जय,जय,शिव, शंकर त्रिलोक नाथी !

मुखमंडल, चंद्र, गंगा,जटा, धारी ।
हस्त विराजत त्रिशूल, डमरू,विष, धारी ।।
संहार,सृष्टि, उत्पत्ति धारी ।
शिव अर्थ कल्याणकारी ।।

जय,जय,शिव, शंकर त्रिलोक नाथी !

शिव प्रेम,स्नेह,धर्म धारी ।
वेदो शिवम, शिवो वेदम।।
अनंत काल शिव ही मानव ।
ललाट, ज्योति धारी ।।

जय,जय,शिव,शंकर त्रिलोक नाथी !

घी, शकर, शहद,दुध दही ।
शिव आराधना अति सरल ।।
बिल्वपत्र,भांग,धतूरे,पुष्प,
पन्चामृत,महामृत्युंजय मंत्र ।।
अति सुख कारी !

जय, जय,शिव,शंकर त्रिलोक नाथी !

रुप लिंग, शिव, शक्ति ।
एकल रूप, सामान वासी ।।
धरती आधारा, आकाश लिंग ।
शिव ही बारह : ज्योतिर्लिंग वासी ।।

जय, जय,शिव,शंकर त्रिलोक नाथी !

शिवलिंग पूजत जो नर नारी ।
सन्तान, धन्य, सद्बुद्धि, दीर्घायु ।।
स्थान बनत वही तीर्थ ।
मनुष्य होत, शिव स्वरूप धारी ।।

जय,जय,शिव शंकर त्रिलोक नाथी !
73. क्या वो प्यार था
क्या वो प्यार था ?
खुली आंखों से
जीवन के सपनें देखना
रातो को करना विचरण
दिन – दोपहर तेरी गलियों के चक्कर ।

लिखना कागजों में, मेरी प्यारी
हर चौक – चौराहे पर तेरा इंतजार
खाना क़समें प्यार के बातो की
कागजो मैं उकेरना अपने जज्बात ।

रातों के पहर का
वो मेरे मन् को कचोटना
दस्तक तेरी, मेरी आँगन मैं फूलों जैसी
बाल्यकाल का वो तेरा – मेरा लड़कपन
थोड़े अबूझे थे हम थोड़े से तुम ।

समझना गुलाब को प्यार की निशानी
किताबों का वो मेरा, तेरा अदल – बदल
लिखना शायरी तेरी जुदाई मैं
क्या वो प्यार था ?
74. पहाड़ी की पीड़ा
रोज चलते हैं मिलो
उबड़ खाबड़ पथरीली राहों मैं
सुविधाओं से अनभिज्ञ
लिए जज़्बातों का वेग भरा ।

देखो तप्ती ग्रीष्म की इस ऋतु मैं
खेतों से उपजाये आजीविका
शरद ऋतु का ये सफेद चादर
जब कर दे तंन, मंन को भी कंपन ।

पहाड़ौ की रातों का ये सुनसान अंधकार
जंगलों की यह निर्दय आवाजें
सर्दियों की यह ठिठुरन
समझीं किसी ने पहाड़ी की पीड़ा ।

दूर से ये पर्वत श्रृंखलाएं दिखतै हैं
पर्यटकों को जो अति सुंदर
समझीं वेदना घास काटती हुई
किसी विहरण की ।

शुख नहीं अपनो का
निहार रही अम्मा, परदेश को
लिये गागर मिलो चलते हुए
फूंक- फूंक कर इन गीली लकड़ियों को ।

दीख रहें ये जो पहाड़ हरे भरे
लुभाते जो मंन सैलानियों का
छुपी वेदनाएँ इनमें अंगिनत ।

समझी किसी ने पहाडी़ की पीड़ा ?
75. हाँ मैं पहाड़ी हूँ
हाँ मैं पहाड़ी हूँ
हिम की धरा मैं रहने वाला
धोती-कुर्ता, टीका, शान मेरी
तिरछी, श्वेत टोपी
सिर पर विराजमान मेरी
अवतरित देव रूह -रूह मैं
निष्पक्ष न्याय करने वाला
जननी देव, ऋषियो की
भूमि मैं रहने वाला
पवित्र गंगा की तरह बहने वाला
हाँ मैं पहाड़ी हूँ ।
हिमालय के शिखर की तरह वर्चस्व मेरा
नैनीताल जैसी अलकल्पनिय गहराई मुझ मैं
ह्रदय से सौम्य, सरल, स्वभाव मेरा
चट्टानों जैसा अडिग, निडर मैं
उपजित इस धरती का श्रृंगार, मेरे ही लहू से
लाखों पग रास्ता नापने वाला
हाँ मैं पहाड़ी हूँ ।।
76. मैं राही तेरे प्यार का
मैं राही तेरे प्यार का,
ख्यालों मैं तेरे जागा, जागा सा रहता हूं,
दिन, पहर मेरे कट जाते हैं
रातों को यादों मैं तेरी
खुद मैं ही खोया, खोया सा रहता हूं ।
बहुत गमगीन, उदास हुई हैं, मेरी ये शामें
जब, जब भी तुझसे बिछड़कर मैं रहता हूं,
ओ मेरी रूपसी प्रियतमा,
प्रेम तेरा एक निर्मल पवन वेग
मैं इसमें मन्द,मन्द सा बहता रहता हूं ।
मैं राही तेरे प्यार का —–

कितना अधूरा जीवन मेरा तेरे बिन
हर क्षण याद तुझे मैं करता हूं,
आंखों में बसाई मैंने सिरत तेरी
यादों को तेरी सीने से लगाए मैं रहता हूं ।
है जो तू मुझसे इतनी दूर
यही गम मैं खाए बैठा हूं,
अपना भी होगा मिलन
यही मैं इस पागल दिल को
कब से समझाए बैठा हूं ।
मैं राही तेरे प्यार का —-
77. बाल कविता -उफ्फ यह गर्मी
अ आ इ ई उ ऊ
ए ऐ ओ औ अं अः उहम, उहम
हाय गर्मी उफ्फ यह गर्मी
मुझे ना भाए यह गर्मी
जग का कैसा यह खेल निराला
ऋतुए करें हैं गड़बड़ घोटाला
चंदा मामा तुम जल्दी से आ जाओ
अपनी शीतल छाया हमें दे जाओ
सूरज चाचू ने हमको धो डाला
तरबतर कर दिया है
हमारा हर अंग शाला
बाहर निकलू मां मुझे डांटे
दिनभर कमरे में दिन है मैंने काटे
कहती बगल वाली मुनिया
सूरज चाचू से इतना क्यों घबराना
पिंटू तुम एसी कूलर घर पर लगवाना
आओ गली में ठंडी रस मलाई खाएंगे
सूरज चाचू को दिखा दिखा कर चीढ़ाएंगे
गर्मी हम यह दूर भगाएंगे ।
78. सफर
ज़िन्दगी के सफर मैं
मुसाफ़िर हजार मिले
कुछ फूल जैसे खिले हूऐ
किन्ही से काँटों के हार मिले,
हर चौक – चौराहे पर अंगिनत भीड़ – भाड़ थी
कुछ बस गए यादों मैं
कुछ “जी” के जंजाल मिले,
ज़िन्दगी के सफर मैं कुछ दोस्त नयै, पुराने
कुछ दिलदार मिले,
कुछ बन गये हमदर्द
किसी से “नैनों” के तार मिले,
बिछड़ति हूई जमीं बिछड़ते रिश्ते – नातेदार, मिले,
कुछ घर कर गये मन मैं,
किन्हीं के दिलों के द्वारा बंद मिले,
सफ़र यूं ही दुनियां का चल रहा, यूं ही चलता रहेगा
राहों मैं ऐ “बिष्ट” यही आरजू मेरी,
मुकमल मेरे खुदा का, मुझे प्यार मिले ।
79. आज रो लेने दो
आज थोड़ा रो लेने दो
छुपे इन दिलों के भीतर
जज़्बातों को थोड़ा बह लेने दो,
सजी इस मधुशाला की
रंगीन, रंगशाला मैं
थोड़ा सा जज़्बाती
मुझे भी आज हो लेने दो,
है कमबख्त छुपा रखें हैं
मैंने इस दिल मैं बहुत दर्द
मुझे भी आज लबो से
अपने अफ़साने कह लेने दो,
हँसी के दीखावाटी
इस नक़ाब के चहेरे से
पर्दो को आज तो उतार लेने दो,
बुजदिल सहमा – सहमा सा
जो रहता है मेरा यह दिल
आज दिल की बातें अपनी
मुझे भी कह लेने दो,
हो जाऊं – मैं भी थोड़ा जज़्बाती
इसमें हर्ज़ ही क्या है
यादौं की पगडंडियों पर
आंसुओं की अश्रु धारा
आज बह लेने दो,
क्या करूं – याद आ जाते हैं
गुज़रे ज़माने के किस्से
फिर वही पुराने
दोस्ती, प्यार,के उन नगमों को
आज फिर कह लेने दो,
मिलंगे ना जानें फिर कभी
दिलों से आज, दिलों की बाते हो लेने दो
आज मुझे भी यारो मेरे – रो लेने दो ।
80. फिर समृद्ध होंगे ये पहाड़
फिर समृद्ध होंगे ये पहाड
अंकुरित नव बीजों से
निर्जीव पड़े हुए घरों के आंगनों से
रहता नहीं कभी धुंआ छंट जाते हैं बूरे वक्त
टीस मन, ह्रदय में
है स्वावलम्बी पहाड़ी – किस बात की,
कट रही तेरी पहाड़ों में जो भी रह – गुजर
हिमालय जैसी – है पहाडी़ शख्सियत तेरी
वक्त का वो तेरा इम्तिहान होगा,
एकांत पड़े इस देव – धरा पर
गूजेंगी फिर मधुर – ध्वनियां
लह -लहराती फसलों से
धरातल ये फिर तेरा विराजमान होगा,
उठ चल – हताशाओं का ये
मुखौटे से अब नकाब हटा
बदलती नहीं तकदीर
आशाओं और रेखाओं से
चमकती है रोशनी हमेशा
अंधेरे से लड़ने के बाद,
समृद्ध होगा फिर ये तेरा पहाड
लहू मैं अपने – कुछ करने की आग जगा,
जीवन बधा मानव का आशाए, बाधाओ से
शिव की इस भुमी का तू ही मालिक
फिर क्यों तेरी ये रुदंत करुण पुकार
हे देव भूमि पुत्र – अंकुरित नव चेतनाओं से
फिर समृद्ध होंगे ये पहाड !!
81. कोई तो समझें
कोई तो समझें दिलो के दर्द को
लिखें हूए कवियों की, कलमों की ब्याख्या को
सुलग रहे मंन के भीतर इन अनगिनत जज्बातों को
कह – कहाँ रहे ठंड में कंपन, इन दर्दनाक आवाजों को
तलाश मिलों चल रहे, मुसाफिरो की मंजिलों को
आते हूए इन तूफानों की आहटो को
उजड़ते हूए किसानों के खेतों की ईन महेनतो को
कोई तो समझें दिलो के दर्द को ।
बिछड़ते रोते हूए अपनो के दर्द को
आँखों में छलक रहे इन जज़्बातों को
गूँजती किलकारी, भुख से बच्चों की
करुणामय आवाजो को ।
बारूदों के ढेरों पर बैठे सैनिको के आत्म – सम्पर्ण को
कोई तो समझे अमर बलिदानो के बलिदानो को
लोटे नही जो वापस, उन आँखों की राह देखती
अनगिनत सुहागिनों के बलिदानों को
देहज,जाती, धर्म के नाम से
लूटी हूई नारी के अभिमानो को
कोई तो समझें दिलो के दर्द को ।
82. कुछ मेरी, कुछ अपनी -कह गया आज यह चाँद
कुछ मेरी कुछ अपनी कहे यह चाँद
निहार रहा कब से- ओढ़े सफेद बादलो की
ये मखमली चादर, मेरे आंगन को
नजरों का प्रेम मिलन हो अब कैसे
आहिस्ता – आहिस्ता गुजर गया
मेरे मन के आंगन से
यह अधखिला खिला हुआ चाँद ।
है रुठा रुठा –
थोड़ा खुद में खोया हूआ यह चाँद
देखे निहारे टकटकी सा लगाए हुए
मन के मेरे इस ह्र्दय – दर्पण को
कुछ अपनी व्यथा, कुछ मेरी व्यथा
कह सुन – गया आज यह चांद ।
कभी दिख रहा, कभी छुप रहा यह चाँद
दामन में लिए- अपने हजारों उज्वलित खुशियां
सोया नहीं रुका नहीं अनगिनत वर्षों से
घर में मेरे घर कर गया आज यह चाँद ।
है सुबह की लालिमा की परछाई सा
ह्र्दय में लाखों ख्वाहिशो को जगाता हुआ
खुद रहा धधक – दर्द असहनीय लिये हूऐ
दिखा रहा, राह, राही को फिर भी
जमावाड़ा लिये तारों का यह चाँद ।
कुछ मेरी, कुछ अपनी –
कह गया आज यह चाँद ।।
83. अब में क्रांति लाऊं कहां
अब में क्रांति लाऊं कहां
नेताओं ने देश लूट चुका
नौजवान हमारा अब सो चुका
अब में क्रांति जगाऊं कहां ।
लगते जहां देश विरोधी नारे
चाहिए अभिव्यक्ति की आजादी
फेंके जाते सैनिकों पर पत्थर
ऐसा दूसरा देश में बतलाऊं कहां
अब में क्रांति लाऊं कहां ।
लूट खसोट की राजनीति
समाज बटा वर्गों में
धर्म के नाम पर होते दंगे
ऐसे में क्रांति, अब में जगाऊं कहां ।
लग रहे जहां फैशन के मेले
इज्जत अपनी छुपाए कौन कहा
चकाचौंध, धन-वैभव नशे की
बीता स्वर्णिम युग क्रांति का
देश भक्ति की ज्योत
अब जगाऊं कहां
अब में क्रांति लाऊं कहां ?
84. फिर प्रलय आएगी
मानव जब होगा
पूर्ण विमुख धर्म से
सज्जन खोने लगे सम्मान
सूर्य – चंद्रमा होने लगे विलुप्त
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी ।
मंदिर – घरों में
जब होने लगे दुराचार
मिट्टी,ज्ञान, दैह का
होने लगे व्यापार
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी ।

शकुनिया जब
चलने लगे पासै
मस्तिक में बढ़ने लगे
जब जीत का भ्रम
होने लगे अभिमानी
विमुख हो जाए
मानव धर्म सै
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी ।
अपने चरम पर
जब पहुंचेगी हिंसा
स्वांस लेना
हो जाए दुर्लभ
होने लगे जब मानव
फिर गिद्ध कि तरह
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी ।

मन – तन
हौ जाय अशांत
विलुप्त हौ जाय
प्रकृति निरमित् संसधान
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी
बहने लगे जब
विपरीत नदियां, पवनें
गुम हो जाए
मंदिरों का शंखनाद
कालचक्र जब बदल लै करवट
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी ।

श्वेत श्यामलरूप बनकर
कल्कि अवतार
फिर अपने को दोहराएगा
उपजित नव, निर्मित युग,
तब सतयुग कहलाएगा !!
85. पथिक
चल रहा हूं,
दुनिया की भीड़ में,
बंन कर पथिक,
मैं भी यहां,
हैं दिखते चेहरे
अनगिनत यहाँ,
कुछ खुश,
कुछ मुरझाए हुए,
ढूंढूं कैसे गम, खुषी,
मिट जाते हैं,
कदमों के निशाँ भी यहां,
चल रहा हूं,
बंन कर पथिक,
मैं भी यहां।

मसगूल दुनिया अपने में ही,
दिल का दर्द,
अपने छलकाऊ कहां,
छटपटा रही है जिंदगी,
मौसमों की तरह,
चंचल इस मन का,
ध्यान लगाऊं कहां,
चल रहा हूं,
बंन कर पथिक,
मैं भी यहां ।

ढूंढ रहा हूं, खोज रहा हूं,
हुं विचलित सा,
मोलभाव के इस जाल में,
लग रही बोलियां,
इंन्सानौ की भी यहां,
कुछ रिश्ते अनजाने,
कुछ जाने पहचाने,
चल रहा हूं,
निभा रहा हूं,
बनकर वक्त का,
मुसाफिर मैं भी यहां
चल रहा हूं,
बंन कर पथिक
मैं भी यहां !
86. तुम बिन, मैं व्यर्थ बेकार
तुम मेरी जीवन संगिनी
मैं तुम्हारा आधार
पड़ै कदम तुम्हारे
जौ मेरे आंगन में
महक उठा मेरा घर संसार
अनगिनत रूप तुम्हारे
धूप में बनी तुम मेरी परछाई
तुम ही शक्ति मेरी
तुम बिन मैं व्यर्थ, बेकार
तुम मेरी जीवन संगिनी
मैं तुम्हारा आधार ।

है बाँध ली प्यार की डोर
मैंने तुमसे
तुम सुर कै संगीत
मैं तुम्हारा साज
तुम संग मेरे हर दिन उत्सव
बिन तेरे जैसे
भंवर में फंसी
नोका कोई मझधार
तुम मेरी जीवन संगिनी
मैं तुम्हारा आधार ।

मैं तुम अर्धनारीश्वर
तुम रूप पार्वती
मैं शिव,
माता – पिता हमारे संसार
तुम बिन
मैं व्यर्थ बेकार !
87. बचपन वाली दीवाली
अब लौट कर
क्यों नहीं आती
वौ बचपन वाली दिवाली
वह फुलझड़ी वह आनार
वह फट, फट, फट
पटाखों वाली लडि
लियै हाथ, जैब मैं
लड्डू, खिल, खिलौनों
चेहरे पर मासूमियत
मुख में सबके लिए
Happy dipawali
अब लौट कर
क्यों नहीं आती
वौ बचपन वाली दिवाली ।

वह बोतल वाले रॉकेट
वौ अनार,वह फुस – फुस बम
डर वह पटाखों में
आग लगाने का
वह मां की डांट फटकार
चकरी वह थाली वाली
अब लौट कर
क्यों नहीं आती
वौ बचपन वाली दिवाली ।

बड़े हो गए हम
या रिश्तौ में
मिठास कम हो गई
वो बचपन वाली
दिवाली ना जानै
कहाँ गुम हो गई !
अब लौट कर
क्यों नहीं आती
वौ बचपन वाली दिवाली !
88. दिल में अजब सा आज शोर हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है
आज हम से अपना कोई दूर हुआ है

भीगी, भीगी मेरी यह पलके अब कहती हैं-
अब उनपे हमारा कहा जोर हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

घिर, घिर आई है काले, काले यह बादल
मौसम यह अब मेरा घनघोर हुआ है
दिल में आज अजब सा शोर हुआ है ।

जी लेंगे यादों में हम तुम्हारी
रुसवाईयों पर किसका कब जोर हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

होंगे तुम्हारे चाहने वाले हजार
पर मुझ सिरफिरे का कब कोई और हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

ए दोस्त तुम्हारी खुशियां तुम्हें मुबारक
पर मेरी रातों की तन्हाईयों का
कब कहा कोई भोर हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

तेरी यादें तेरी सूरत पर
लिखूंगा फिर एक नई गजल
टूटे हुए दिलों की कलमों पर
कब किसका जोर हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

मैं राही खुद का अकेला ही
कब इस जीवन में
किसका कोई और हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।
89. हां मैं हूं प्रकृति प्रेमी
हां मैं हूं प्रकृति प्रेमी
देव तुल्य ईश भूमि का
अवतरित जहाँ गंगा
शिव के कैलाश का
इन असंख्य
हिंदू तीर्थ स्थलों का
इन ऋषि ज्ञानियों की
तपोभूमि का
हां मैं हूं प्रकृति प्रेमी ।
तीर्थ स्थल बद्रीनाथ
केदारनाथ हरिद्वार का
नैनीताल की नंदा दैवी
अल्मोड़ा पिथौरागढ़
गौरव के इतिहास का
हां मैं हूं प्रकृति प्रेमी ।
बागेश्वर की धार्मिक गाथाओं का
चंपावत मसूरी कि
पहाड़ों, नदियों की बहती
अद्भुत छटाओं का
हां मैं हूं प्रकृति प्रेमी ।
पिथौरागढ़, उधम सिंह नगर
की भव्य संस्कृति का
इस ठंडे जलवायु
चीड़, बांस देवदार
हिम संचालित घाटी इन फूलों का
हां मैं हूं प्रकृति प्रेमी ।
यहां की लोक कलाओं
विविध यहां के त्योहारों मेलों का
गोलू कत्यूर देवों
की ईश भूमि का
हां मैं हूं प्रकृति प्रेमी ।
महान् जिया रानी
गढ़वाल कुमाऊं के
भव्य इतिहास का
हां मैं हूं प्रकृति प्रेमी
उत्तराखंड की इस
देव भूमि का !
90. नारी शक्ति
क्यों घूर रहे हो, भौंऐ तानै हुए
है समाज के अनुयाई
कहां गई तुम्हारी सभ्यता
कहां गयै तुम्हारै संस्कार
चीरहरण हो रहे हैं, फिर द्रोपदीयो के
बन गए हम, फिर मुक दर्शक
उठो जागो हे वीर छत्रियों
चीर दो सीने इनकै, भीम की तरह
ना बनो दुर्बल, ना बनो लाचार ।
कब तक देती रहैंगी परीक्षा
देवीया सीता, इस अग्नि कुंड में
क्यों सुन, सहन रहे हैं हम
इन धोबियों की, लांछन ताने जुल्म
नारी पर युगों से बारंम बार
उठो हे वीर छत्रियों
ना बनो दुर्बल ना बनो लाचार ।
दुर्बल अहसाय कोमल, नहीं यह नारी
ऋणीं हौ तुम इसके, कभी मातृत्व प्रेम
कभी दुर्गा काली रूप भी है इसके
अज्ञानी हो गए हैं हम
या ज्ञान हमने पूर्ण पा लिया
यह मेरे भारत की कैसी विडंबना
बेटी बचाओ नारा भी भारत को दे दिया
उठो है वीर छत्रियौं
ना बनो दुर्बल ना बनो लाचार ।
क्यों पट्टियां बाध ली आंखों में
क्यों सो गए हम गहरी नींद
उठो है वीर छत्रियों
है रगौ में बसा तुम्हारे खून
तुम मैं भी है भीम
तुम मैं भी है कृष्ण
उखाड़ फेंको उन हाथों को
जो करे नारी जाती का खून !!
91. उठ चल दो कदम
मौसम आज रंगीन हुए पड़े हैं
धरातल पर उतर आये तारे
आसमान अब बिरान हुए पड़े हैं
उठ चल दो कदम
भूल गमें जहाँ
देख मन की आंखों से
खुशियों के यहां
निशान पड़े हुए हैं ।
क्यों जीना क्यों रोना
सिसक – सिसक कर
तकदीर बदलने के
जब हमारे पास
इम्तिहान पड़े हुए हैं ।
उठ चल देख
मौसम आज रंगीन हुए पड़े हैं
धरातल पर उतार दिया चांद
मुट्ठी में आज आसमान पड़े हुए हैं
रख हौसला अपने ऊपर
सूरज को दिखा दे अपनी गर्मी
चाहे पैरों में हमारे
छालों के निशान पड़े हुए हैं ।
चल ऊड़ पंछी
अपने घरौंदे से
खुश रहने के यहां लाखों
जहान पड़े हुए हैं
तेरा क्या था क्या लाया
सीख वही पुरानी
निर्भर तुझ पर
तेरा ही जीवन
एक तरफ मंदिर,
एक तरफ शमशान
पड़े हुए हैं ।
उठ चल है मानव
जीने व सिखनें कै यहाँ
अनगिनत निशान पडे़ हुए हैं !!
92. मुबारक तुमको तुम्हारी आजादी
मुबारक तुमको तुम्हारी आजादी
खींच लो रेखाएं चाहे तुम
कागज पर कितने भी विकास की
अशिक्षित, अहसाय लाचार गरीब
देश की आधी आबादी
मुबारक तुमको तुम्हारी आजादी ।

पिट लो ढोल ढिंढोरा
कितने भि अपने बखान की
सच छुपता नहीं, सच मिटता नहीं
चाहे पट्टीया बधवा दो, आंखों में समाज की
मुबारक तुमको तुम्हारी आजादी ।

हैं घात लगाये, कदम-कदम पर
दौलत जुल्म के ये ठेकेदार
घूर रहे आंखें ताने हुए, मुखौटा पहने धर्म का
सर लिए रावण जैसे हजार
मुबारक तुमको तुम्हारी आजादी ।

धर्म, कुल, ऊंच, नीच
शब्द यहाँ भेद भाव जणित
है बटें हुए यहां मानव, सिक्को के दो भागों पर
यह चकाचौंध इन महलो में
झोपड़ियों में अब भी उजाले नहीं ।
फिर यह कैसी आजादी ?
मुबारक तुम्हीं को, तुम्हारी आजादी !
93. हां मैं भी कवि हूं
हां मैं भी कवि हूं
लिख लेता हूं, आडि तिरक्षि लकीरें
जिंदगी के बनै हुए पन्नों पर
सीख रहा हूं चलना संभलना
जिंदगी व मृत्यु के बिच पड़ाव पर
हुं शीश झुकाकर मैं भी खड़ा
ज्ञान, ज्ञानियों के इस बाजार में
कभी सीख लैता हूं तैरना
कभी बह जाता हूं, जिंदगीयों के बहाव पर ।
है लालसा मेरी भी, अपना हौ एक दर्पण
इसलिए देख लेता हूं, बंद आंखों से भी
यै इंद्रधनुष्यि रंग
हां मैं भी कवि हूं ।
लगा हूं ना जाने
किस जिंदगी की उधेड़-बुन में
कुछ रिश्ते यहां उलझे, कुछ सुलझै हुए
कुछ शामें गई है ढल, कुछ अभी भी बचि हैं
जिंदगी के लैनैं इम्तिहानों में
हां मैं भी क्या कवि हूं ?
94. मैं और मेरा यह पहाड़
मैं और मेरा यह पहाड़
पर्वतों से पिघलता हुआ यह बर्फ
कहीं पर हिम वाली चोटी
कहीं पर गंगा को छूता हुआ हरिद्वार
गांव -गांव हैं सुशोभित,यहां हरियाली से
यह कोहरे से लिपटे हुए घने जंगल
यह रंग -बिरंगे पंछी यह झरने
यह आम, आरू, चीड़ पेड़ देवदार
मैं और मेरा यह पहाड़ ।
यहां निर्मित मिट्टी लकड़ी वाले घर
ऊचैं नीचे टेढ़े-मेढ़े खेत, रास्ते
पल-पल बदलती हुई ऋतुऐ की यहां बहार ।
यह हाथ को छूता हुआ सूरज
यह कानों में गूंजता हुआ –
पंछियों, हवाओं का संगीत
है सुशोभित जहां हिमालय
तेरा स्वर्ग मेरा स्वर्ग – मैं और मेरा यह पहाड़ ।
यहां पंख फैलाते अनगिनत पंछी
ऋतुऐ आए जहां बदल-बदल
यह रिम -झिम बारिश
यह ठिठुरते, कंपन वाली ठंड
यहां त्योहारों का लगा अंबार
मैं और मेरा यह पहाड़ ।
यह मैघौ का – फैला हुआ शफेद चादर
यह खैतो, पैडौ, में उडते –
किट, पतंगे, पंक्षी
यह हरै भरै – खेत, फल -फूल,घने जंगल,
मैं और मेरा यह पहाड़ !!
95. कुछ मैं कहूं अपनी, कुछ तुम कहो
कुछ मैं कहूं अपनी, कुछ तुम कहो
जिंदगी बोझिल ना हो जाए चलते-चलते
कभी मैं खुश रहूं, कभी तुम खुश रहो
बहुत मुश्किल है किसी का
हाल ऐ दिल सुनना इस जमाने में
करने गुफ्तगू – कभी फुर्सत में तुम रहो कभी मैं रहूं ।
माना हैं चेहरे यहां पर, सब के अलग – अलग
कभी इन्हें तुम पढ़ो कभी हम पढ़ें
ना उलझने दो यारो –
बंद पड़ी हुई गाठों को
थोड़ा सा इसमें रिश्तो की मिठास
तुम भरो थोड़ा हम भरे
बड़ी कशमकश है जिंदगी में
कुछ मैं कहूं अपनी, कुछ तुम कहो ।
है जहां गम और खुशी से
रिश्ता जिंदगी भर का
थोड़े से रंग इसमें, तुम भरो थोड़ा हम भरै
ना हो जाए जिंदगी बोझिल चलते-चलते
किसी का गम हम ले चलें
किसी का तुम ले चलो !
96. पहाड़ों की बारिश
पहाड़ों की बारिश का
यह मौसम सुहावना
जमी पर गिरती यह निरमल बूंदै
मेंढक की वह बोली टर- टर
आसमान में छठा बिखेरते
यह रंग-बिरंगे तारे
कानों में मधुर ध्वनि यह
बारिश की टप, टप, टप ।
पेड़ों के पत्तों कि यह कैसी सरसराहट
निकलता चूल्हे से वह धुआ
रोशनी बिखेरते, जुगनुओं की वह फुसफुसाहट
मौसम आया पहाड़ों में यह अलबेला ।
चोखट पर दस्तक देता
जैसे मौसम जाड़ों का
कहीं पर है धुंध, कहीं पर गिरे यह पाला
आई पहाड़ों की मिट्टी से कैसी
यह अपनेपन की खुशबू
फिर याद आया मौसम
पहाड़ों की बारिश का वौ भिगोनै वाला ।
97. यादें
जैसे यादों में बसी, किसी की मुमताज
रहोगी हर पल मेरे हृदय में, तुम कल और आज
नयन तेरे जैसे, सीप के मोती
अक्स तेरा देख, बजे दिल में साज
मूरत तुम देवी की, मेरे मन मंदिर में
तुम्हारा ही वास ।
छुवन तुम्हारा बहता पानी,काया तुम हो फूलों की
विषम परिस्थितियों में, तुम्हारे भीतर दृढ़ विश्वास
जैसे यादों में किसी की मुमताज,
मेरे हृदय में, वैसे ही तुम्हारा वास !
98. गुलाब
पन्ने पलटते -पलटते आज
उनका रखा हुआ गुलाब मिल गया
जिंदगी को आज ईस मोड़ पर
उनसे पूछा हुआ जवाब मिल गया ।
कुछ पत्ते थे मुरझाए हुए
कुछ मैं खुशबू अभी भी बाकी रह गई
बस विराने ए जिंदगी –
फ़लसफ़ा यादें जिंदगी ही रह गई ।
कमबख्त बड़ा बेदर्द है यह वक़्त
आज फिर मीठा जख्म यह दे गया
कुछ धुंधली यादों से आईने पर
उनका अक्स फिर उकेर गया
पन्ने पलटते -पलटते जिंदगी के
बस अब यादों में सिर्फ –
उनका दिया गुलाब ही रह गया !!
99. मां
आज फिर अपनी मां की
गोद में सोने का मन करता है
बिन बताए आज फिर
रोने का मन करता है ।

आज फिर बचपन की यादों में
खो जाने का मन करता है
वह घुटनों के बल चलते हुए
नन्है – नन्हे कदम, चलने को मन करता है ।

आज फिर अपनी मां की लोरी
सुनने को मन करता है
आज फिर अपनी मां की
उंगली पकड़ कर चलनै कौ मन करता है ।

क्या हुआ बड़े हो गए हैं तो
आज फिर अपनी मां के हाथों का
खाने का मन करता है

उल्झी है जब से जिंदगी- जिंदगी बनाने में
आज फिर अपनी मां के लिए
कुछ कर गुजरने का मन करता है
आज फिर अपनी मां की
गोद में सोने का मन करता है ।
100. पहाड़ों के नारी की व्यथा
कैसे सुनाऊं पहाड़ों के नारी की यह व्यथा

हाथ मैं दातूल, कमर में कुटव
चहेरे पर थकान का नहीं कोई नामोनिशा
भोर उठे दिनभर खेतों में लगे
क्या मौसम धूप, क्या मौसम वर्षा
कैसे सुनाऊं पहाड़ों के नारी की यह व्यथा ।

त्याग और बलिदान की
देती हमें एक नयी परिभाषा
पहाड़ों के परिवार कि डोर
कि बधि इनहि से आशा
ना चिड़चिड़ाहट है चहेरे पर
ना किसी से गिला शिकवा
कैसे सुनाऊं पहाड़ों के नारी की यह व्यथा ।



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