कविता – “मैं अटल हूँ”

स्वयं के आत्मबल का साक्षात्कार कराती एक दिव्य कविता जो माननीय पूर्व प्रधानमंत्री एवं मूर्धन्य कवि, महान राष्ट्रभक्त और ग्वालियर के गौरव लाड़ले सपूत स्वर्गीय श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी को श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित है और उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए उनके पुण्यतिथि दिवस पर 16 अगस्त 2018 को लिखी गई है |

“कविता- मैं अटल हूँ”

1. बिहंगों सा चहकता मैं,
चाँद सा और चमकता मैं,
विद्युत लड़ी की माल सा,
और दामिनी सा दमकता मैं |
मैं चपल हूँ, मैं चपल हूँ, मैं अटल हूँ ||

2. मैं विवस्वत के वलय सा,
सिंधु में आती प्रलय सा,
मैं निडर हूँ सिंह सा और
अडिग हूँ मैं हिमालय सा |
मैं अचल हूँ, मैं अचल हूँ, मैं अटल हूँ ||

3. सूर्य की एक ज्वाल जैसा,
अंगार की मैं माल जैसा,
काल से डरता नहीं मैं,
काल के भी काल जैसा |
मैं प्रबल हूँ, मैं प्रबल हूँ, मैं अटल हूँ ||

4. भार्गव परशु का खण्ड हूँ,
पावक सा भी प्रचण्ड हूँ,
श्रीकृष्ण के वचनों से जाना,
मैं आत्मा अखण्ड हूँ |
मैं धवल हूँ, मैं धवल हूँ, मैं अटल हूँ ||

5. मृत्यु से क्योंकर डरूँ मैं,
शत्रु का भय क्यों करूँ मैं,
जीवन हूँ चिर मैं नित्य हूँ,
हर क्षण को ही फिर क्यों मरूँ मैं ?
मैं सबल हूँ, मैं सबल हूँ, मैं अटल हूँ ||

कवि शिवम् सिंह सिसौदिया ‘अश्रु’
ग्वालियर, मध्यप्रदेश,
सम्पर्क- 8602810884, 8517070519

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