Sep 8, 2016 · 1 min read

कविता :– काम करने चला बचपन !!

कविता :– काम करने चला बचपन !!

खानें की चाह पे खोया बचपन
रातों को राह पे सोया बचपन ,
सहम-सहम के रोया बचपन
फिर भी बोझा ढोया बचपन !

मुश्किलो मे पला बचपन
काम करने चला बचपन ,
धूप आँच से जला बचपन
ठण्ड मे भी गला बचपन !

तूफानो मे हिला बचपन
मयखाने मे मिला बचपन ,
जख्मों को भी सिला बचपन
कहीं , कलियों सा भी खिला बचपन !

जिसनें भी ये जना बचपन
पापी हाथो से हना बचपन ,
जुल्म से भी सना बचपन
यहाँ कातिल बना बचपन !

यहां इक्कीसवी सदी का बचपन
चौराहे पे बिका बचपन ,
सम्बिधान ने लिखा बचपन
बोझ उठाते दिखा बचपन !

भारत का भाग्य विधाता बचपन
बेच रही है माता बचपन ,
खाने को तरसाता बचपन
उनसे भीख मगाता बचपन !

कलम की जगह तलवार थमाया बचपन
क्यों हथियार उठाया बचपन ,
मस्ती मे मतवाला बचपन
कहां गया दिलवाला बचपन !

“देश बेहाल चलाने वालों
तुम भी तो अन्जान नही !
बचपना न कर यूँ बचपन से
बिनु बचपन देश जवान नही ” !!

(- Anuj Tiwari “Indwar” -)

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