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“कल्पना ,आयोजन और प्राप्ति “

भक्त की अपनी कल्पना,
वक्त के साथ उलझ जाती है,
साँप तो निकल जाता है,
लकीरें रह जाती हैं,
.
समझ से उसे उपयोगी बनाने की,
आयोजन कर हरक्षण आनंद मनाने की ,
प्राप्ति की हर कोशिश,
आखिर बेअसर हो जाती है,
.
एक लय,
एक अनुभूति,
कुछ चाह की इच्छा,
कुछ को व्यर्थ,
कोई को समर्थ,
कोई है जिसे वो मिला,
जिससे वो निज-दर्शन कर पाता है,
.
भक्त की कल्पना,
संसार में आयोजन,
व्यक्तित्व की खोज,
निजता की खोज,
परम-सुख की अनुभूति,
किसी किसी को ही प्राप्त हो पाती है,
.
डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,

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