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Mar 3, 2022 · 6 min read

*कलम शतक* :कवि कल्याण कुमार जैन शशि

*पुस्तक समीक्षा*
*कलम शतक* :कवि कल्याण कुमार जैन शशि
*संस्करण* : प्रथम 1987
*प्रकाशक* :जय तोष प्रकाशन, गुइन रोड, अमीनाबाद, लखनऊ
*मूल्य* ₹5
*प्रष्ठ* 46
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*समीक्षक :* रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा
रामपुर( उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451
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*शशि जी की कालजयी कृति कलम शतक*
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कई साल पहले शशि जी ने _कलम_ नामक पुस्तक लिखी थी । उसमें 69 पद थे। _कलम शतक_ में 31 पद बढ़ गए हैं यानि नाम के अनुरूप 100 पद हो गए हैं। यह सभी पद गेय हैं और इनका सस्वर पाठ जिन लोगों को शशि जी के मुख से कवि सम्मेलनों-गोष्ठियों आदि में सुनने का शुभ अवसर मिला होगा ,वह भली भांति जानते हैं कि अपने प्रवाह से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने की इनमें अपार शक्ति है । 80 वर्ष की आयु में भी जब शशि जी साहित्य-संसार को कुछ नया देते हैं ,तो पुस्तक के 99 वें पद में प्राण आ जाते हैं :-

*थाम-थाम कर कलम चला हूँ,किंतु अभी न थकान है*
*हाथ नहीं काँपेंगे मेरे ,जब तक कलम जवान है*

किंतु वहीं मन में उदासी छा जाती है जब अत्यंत विरोधाभास उत्पन्न करता हुआ यह अंतिम एक सौ वाँ पद पढ़ता हूँ:-

*यह कोरे कागद हैं ,मैं तो भूलों का चिर दास हूँ*
*अपने उत्तरदायित्वों से ,अब लेता अवकाश हूँ*
*शायद कोई आँके क्षमता ,मेरी मूक उड़ान की*

अंतिम पद में निराशा है ,पलायन है ,नितांत व्यक्तिगत-सा बन गया है यह । पर व्यक्तिगत क्यों ? जो कलम कभी नहीं रुकती ,जिसके शब्दकोश में अवकाश नामक शब्द नहीं है, वही तो शशि जी की कलम का नाम है । कलम पर सबसे बड़ा अत्याचार है उससे रुक जाने को कहना ।
_कलम शतक_ मूलतः लेखनी की शक्ति को आधार मानकर लिखा गया है। पर इसकी दृष्टि विराट है। इसकी कलम किसान का हल भी है :-

*हल में भूमि चीरती कीली ,सच्ची कलम किसान की*
*अत्याचार कलम मत सहना तुझे कसम ईमान की*

वस्तुतः कवि सत्य और न्याय की पक्षधरता का विराट मूल्य कलम के माध्यम से पाठकों को देना चाहता है । उसकी कामना है कि कलम असत्य ,अन्याय और अनाचार के विरुद्ध संघर्ष करे । भारत के गौरव और संस्कृति के श्रेष्ठ मूल्यों की वंदना करे , राष्ट्रभक्ति का जयघोष करे और विश्व शांति के पक्ष में अपना मत दे। कलम महज तुकबंदी नहीं है । इसमें कवि का वह आदर्श गूँजता है ,जो किसी भी कवि का होना चाहिए । कलम में एक समग्र जीवन दर्शन है। कलम में चिंतन का बाहुल्य है । कलम में कलम का धर्म है । कलम में कलमकार का आदर्श है । कलम मानवता का महामंत्र है। कलम राष्ट्र की ओजस्वी वाणी है । कलम इस देश के इतिहास की गरिमा का गान करती है । कलम विचार की श्रेष्ठतम ऊँचाई को हमारे सामने रखती है ।
शशि जी की कलम सूर और तुलसी की कलम को नमन करती है ( पद 10 )
रघुवंश ,महाभारत और चंद्रगुप्त युग के महान भारतीय वैभव का स्मरण करती है ।
वेदव्यास की प्रतिभा का स्मरण करती है( पद 18 )
कालिदास की ज्ञान-रश्मि का बोध कराती है (पद 19)
तुलसी को बारंबार प्रणाम करती है (पद 20)
मीरा के कृष्ण-प्रेम की गाथा गाती है( पद 21)
कबीर की निर्भयता की प्रशंसा करती है (पद 32)
सावित्री के पतिव्रत-धर्म के कौशल की कथा कहती है (पद 24)
नालंदा आदि के वैभव को याद करती है (पद 25)
नेत्रहीन कलमकार मिल्टन की लिखी कृति _पैराडाइज लास्ट_ के कमाल को सराहती है( पद 26)
जार-सरकार की क्रूरता की निंदा करती है और उसके विरुद्ध लड़ने वाले कलाकारों की वंदना करती है (पद 27)
कम्युनिस्ट माओ की व्यक्ति पूजा को अस्वीकार करती है (पद 28)
कविवर भूषण द्वारा औरंगजेब को निर्भीकता पूर्वक दी गई चुनौती की ओजपूर्ण चर्चा करती है (पद 29)
गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों के महान बलिदान के प्रति अपना शीश झुकाती है (पद 30)
स्वतंत्रता संग्राम के नायक बहादुर शाह जफर के क्रांति कर्म को नमन करती है( पद 31)
लक्ष्मीबाई के स्वातंत्र्य संघर्ष की महानता की यशोगाथा कहती है( पद 32 )
ईसा की करुणा मुक्त कंठ से कहती है (पद 34)
प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान को सराहती है (पद 37)
स्मरणीय कृतियों के अंतर्गत गीतांजलि, साकेत
उर्वशी ,प्रियप्रवास ,कामायनी ,हल्दीघाटी और मधुशाला की श्रेष्ठता की चर्चा करती है( पद 38 )
रसखान के कृष्ण-भक्ति काव्य की मधुरता पर मोहित होती है (पद 41)
ट्राटस्की और खलील जिब्रान की ओजस्वी पुस्तकों की चर्चा करती है (पद 45)
कविवर चंद और चौहान के स्वर्ण युग का स्मरण कराती है ,जब लेखनी ने युग बदला था ।(पद 61)
ऊदल और मलखान के आल्हा के आह्लाद में डूब जाती है (पद 62)
राजस्थान के जौहर ,जो वस्तुतः सती प्रथा का समर्थन नहीं करती ,की अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में स्मृति दिलाती है (पद 63)
वीर महाराणा प्रताप की देशभक्ति की गाथा गाती है (पद 64)
पंडित नेहरु की जनप्रियता का बोध कराती है (पद 66)
कवि फिरदौस की सत्य-प्रियता का यश गाती है( पद 67 )
गालिब को एक कवि के रूप में श्रद्धा से स्मरण करती है (पद 68)
खजुराहो की कामुक कृति की अशिष्टता को मानव-गरिमा और मर्यादा के विरुद्ध मानती है (पद 72)
हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने को ऐतिहासिक रूप से असभ्य एवं अमानुषिक घटना के रूप में याद करती है (पद 73)
शीरी-फरहाद के प्यार को भी याद करती है (पद 81)
गाँधी के नमक-सत्याग्रह का स्मरण (पद 88)
लुकमान हकीम की विद्वत्ता (पद 95)
वाल्मीकि ,अरविंद ,दयानंद ,विवेकानंद की दार्शनिक ज्ञान वृष्टि का पवित्रता पूर्वक स्मरण करती है(पद 96)
और कह रही है कि अहिंसावादी बुद्ध-महावीर के अनुयाई होने के बावजूद पाकिस्तान की चुनौती हम स्वीकारेंगे (पद 97)
पाठक महसूस करेंगे कि उपरोक्त पदों में कलम अथवा कलम की सीधी-सीधी महत्ता कम ही कही गई है । वस्तुतः कलम को माध्यम मानकर कवि ने चिंतन पक्ष को प्रस्तुत किया है और इतिहास ,धर्म ,संस्कृति, प्रखर राष्ट्रीयता और विश्व प्रेम आदि विषयों पर हमें हमारी विरासत के मूल्यवान तत्वों से परिचित कराया है । कलम भारतीय इतिहास के यशस्वी महापुरुषों के चित्र पाठक के सामने रख पाई है, यह एक बड़ी उपलब्धि है।
_कलम_ में कलम का धर्म कवि की कलम से कागज पर कितने सुंदर रूप से उतारा गया है:-

*कलम व्यष्टि है ,कलम सृष्टि है ,निर्गुण है, निष्काम है*
*जिसमें सत्यम शिवम सुंदरम ,कलम उसी का नाम है* ( पद 5 )

कलम की निर्भयता और प्रखरता को प्रकट करने वाली कवि की यह पंक्तियाँ कितनी प्रेरणादाई हैं :-

*यों तो जिसके पास कलम है कुछ लिखता ही दिखता है*
*लिखना उसका है जो सिर से कफन बाँध कर लिखता है*
*हुई कहाँ परवाह कलम को तख्त-ताज-सुल्तान की*
*अत्याचार कलम मत सहना तुझे कसम ईमान की*
(पद 16)
वास्तव में देखा जाए तो हर पद में दोहराई जाने वाली अंतिम पंक्ति *अत्याचार कलम मत सहना तुझे कसम ईमान की* जिन पदों में बहुत प्राणवान हो उठी है ,पद 16 उसमें से एक है। यद्यपि यह सच है कि हर जगह अंतिम पंक्ति जो कि आक्रोश पूर्ण और संघर्ष की मुद्रा में है ,अनेक कोमल अभिव्यक्तियों के साथ तालमेल भी बिठा पाती है । बाहरहाल आगे चलते हैं और पाते हैं कि कितनी सादगी से कवि सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता के लेखकीय आदर्श को कह देता है । इसका एक अच्छा नमूना देखिए :-
*समदर्शी है कलम ,कलम का अंदर-बाहर एक है*
*कोई मजहब नहीं कलम का, मंदिर-मस्जिद एक है*
*इसके लिए बराबर ही है बात राम-रहमान की*
*अत्याचार कलम मत सहना तुझे कसम ईमान की*
कुल मिलाकर कलम शशि जी की कलम से जन्मी वह रचना है जिसे पढ़कर मन को काव्य का आनंद ही नहीं मिलता अपितु विचार जगत को भी पर्याप्त खुराक मिलती है । अतीत से कटे ,संस्कृति को विस्मृत किए हुए और सांप्रदायिकता के विष में डूबे देश को शशि जी की कलम पढ़ना जरूरी लगता है । कलम में कलमकार का धर्म और रचनाकार का जो आदर्श प्रस्तुत किया गया है ,वह विशेष रूप से अभिनंदनीय है । कलम का चलना, जोरदार चलना, जहाँ चाहिए वैसे चलना ,परिणामों के प्रति बेपरवाह हुए चलना ,निर्भय-निर्भीक और निष्पक्ष होकर कलम का चलना ,यही _कलम शतक_ का संदेश है।

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