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कलम और दौलत

कलम जो जज़्बात की सहेली थी ,
दर्द को उसके वो आवाज़ देती थी ।

ज़माने का सताया शायर जब रोता था,
कलम ही उसके अश्क पोंछा करती थी ।

जब जब इश्क महबूब को सदा देता था ,
यह कलम मुहब्बत के तराने छेड़ती थी ।

जंग ए मैदान में सिपाही को जोश दिलाती,
उसकी बहादुरी के नगमें कलम गाती थी।

गुजरे ज़माने में तो बहुत होते थे कद्रदान ,
और यह कलम उनकी इबादत होती थी ।

ज़माने का दस्तूर ही जब ऐसे बदल गया है ,
रोजगार बन गई जो शौक ए तबीयत होती थी।

अब वैसे कद्रदान भी ना रहे सच्चे हुनर के हुजूर!
बाजार में बिक रही है जो महलों की जीनत थी ।

कलम का सिपाही ही दौलत के आगे झुक गया,
मजबूरी बन गई जो कभी ताकत हुआ करती थी ।

देख कर ऐसे हालात “अनु ” बड़ी मायूस हो चुकी है ,
उन अरमानों का क्या करें जिनकी सदा ही कलम थी ।

4 Likes · 8 Comments · 368 Views
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