Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
Sep 19, 2017 · 1 min read

कमी सी है

सुन,
कुछ कमी सी है,आंखों में भी नमी सी है।
समय निकला जा रहा नित,मुट्ठी से रेत सा,
जिंदगी है रफ्तार में और सांसें थमी सी हैं।
खड़ी हो रही हर जगह गगन चुंबी इमारतें,
मगर खिसक रही मानों,पैरों तले ज़मीं सी है।
दिखतें हैं गुलाब शूलों में भी मुस्कुराते नीलम
लगता है उनकी भी हालत बिल्कुल हमीं सी है।
इंसान इंसानियत नोचता है बीच बाज़ारजिस तरह,
सुन,लहु धमनियां लग रहीं सबकी अब जमी सी हैं।

नीलम शर्मा

126 Views
You may also like:
रेलगाड़ी- ट्रेनगाड़ी
Buddha Prakash
पिता का दर्द
Nitu Sah
सच्चे मित्र की पहचान
Ram Krishan Rastogi
ग़ज़ल / (हिन्दी)
ईश्वर दयाल गोस्वामी
मत रो ऐ दिल
Anamika Singh
कर्म का मर्म
Pooja Singh
रिश्तों में बढ रही है दुरियाँ
Anamika Singh
जीवन की दुर्दशा
Dr fauzia Naseem shad
जीवन के उस पार मिलेंगे
Shivkumar Bilagrami
संविदा की नौकरी का दर्द
आकाश महेशपुरी
जी, वो पिता है
सूर्यकांत द्विवेदी
लाचार बूढ़ा बाप
jaswant Lakhara
श्रीमती का उलाहना
श्री रमण 'श्रीपद्'
ओ मेरे साथी ! देखो
Anamika Singh
अपनी आदत में
Dr fauzia Naseem shad
माँ
डा. सूर्यनारायण पाण्डेय
गुरुजी!
Vishnu Prasad 'panchotiya'
ख़्वाब सारे तो
Dr fauzia Naseem shad
आजादी अभी नहीं पूरी / (समकालीन गीत)
ईश्वर दयाल गोस्वामी
आत्मनिर्भर
मनोज कर्ण
मेरी लेखनी
Anamika Singh
✍️ईश्वर का साथ ✍️
Vaishnavi Gupta
कुछ नहीं इंसान को
Dr fauzia Naseem shad
प्यार की तड़प
सुरेन्द्र शर्मा 'शिव'
मेरा खुद पर यकीन न खोता
Dr fauzia Naseem shad
ग़ज़ल /
ईश्वर दयाल गोस्वामी
बताओ तो जाने
Ram Krishan Rastogi
पिता का पता
श्री रमण 'श्रीपद्'
कभी ज़मीन कभी आसमान.....
अश्क चिरैयाकोटी
💔💔...broken
Palak Shreya
Loading...