Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings

औरत

औरत

औरत, जितना धरती होती है
उससे ज्यादा अम्बर होती है,
ऊंचाइयों में पहाड़ होती है,
गहराई में समंदर होती है.
वो जगत नियंता की जननी,
सृष्टि में सबसे सुन्दर होती है,
न्योछावर होने-करने के मूल सुख में,
कभी वो आंधी तो कभी बवंडर होती है.
जिंदगी के आंगन को पलकों से बुहारती
वो आधा बाहर, चौगुना अन्दर होती है,
समर्पण में दिलो-जान देने वाली
अपने पे आ जाए तो सिकंदर होती है.
प्रदीप तिवारी ‘धवल’

340 Views
You may also like:
शरद ऋतु ( प्रकृति चित्रण)
Vishnu Prasad 'panchotiya'
तप रहे हैं प्राण भी / (गर्मी का नवगीत)
ईश्वर दयाल गोस्वामी
बुध्द गीत
Buddha Prakash
मुर्गा बेचारा...
मनोज कर्ण
झुलसता पर्यावरण / (नवगीत)
ईश्वर दयाल गोस्वामी
प्रकृति के चंचल नयन
मनोज कर्ण
✍️कोई नहीं ✍️
Vaishnavi Gupta
फूल और कली के बीच का संवाद (हास्य व्यंग्य)
Anamika Singh
One should not commit suicide !
Buddha Prakash
चोट गहरी थी मेरे ज़ख़्मों की
Dr fauzia Naseem shad
गर्म साँसें,जल रहा मन / (गर्मी का नवगीत)
ईश्वर दयाल गोस्वामी
पिताजी
विनोद शर्मा सागर
ग़ज़ल /
ईश्वर दयाल गोस्वामी
# पिता ...
Chinta netam " मन "
परिवाद झगड़े
ईश्वर दयाल गोस्वामी
दर्द की हम दवा
Dr fauzia Naseem shad
बुढ़ापे में अभी भी मजे लेता हूं
Ram Krishan Rastogi
*"पिता"*
Shashi kala vyas
✍️पढ़ रही हूं ✍️
Vaishnavi Gupta
चलो एक पत्थर हम भी उछालें..!
मनोज कर्ण
✍️रास्ता मंज़िल का✍️
Vaishnavi Gupta
अधर मौन थे, मौन मुखर था...
डॉ.सीमा अग्रवाल
भूखे पेट न सोए कोई ।
Buddha Prakash
कर्ज भरना पिता का न आसान है
आकाश महेशपुरी
अनमोल राजू
Anamika Singh
पिता मेरे /
ईश्वर दयाल गोस्वामी
नास्तिक सदा ही रहना...
मनोज कर्ण
तू तो नहीं
सुरेन्द्र शर्मा 'शिव'
रात तन्हा सी
Dr fauzia Naseem shad
इश्क कोई बुरी बात नहीं
सुरेन्द्र शर्मा 'शिव'
Loading...