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ओज- कविता (धधकती आग है दिल में)

धधकती आग है दिल में
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धधकती आग है दिल में जो हर पल ही सुलगती है ,
जिन्दगी हो रही धूआँ कभी अंगार लगती है ।
जमाना कह रहा मुझसे बगावत करने लग जाऊँ ,
जमाने को बदलने की एक आरजू सी पलती है ।।
धधकती……
जमाने से हूँ मैं घायल और पत्थर न बरसाओ ,
पत्थरों की तरह निर्मम निर्दय मुझको न बनाओ ।
पत्थरों पर सुमन बरसाने की चाहत मचलती है ।।
धधकती ………..
िसी से है न गिला शिकवा मुकद्दर से हूँ मैं हारा ,
मेरी तकदीर ने कर दिया है मुझको ही बेचारा ।
चलता हूँ मैं उससे आगे मेरी तकदीर चलती है ।।
धधकती………….
नहीं फिर भी मैं बेबस नहीं बेचारा भी मैं हूँ ,
टूट – टूट कर मुकद्दर से न अब तक हारा भी मैं हूँ ।
मेरी हिम्मत मेरे हौसलों को हरपल ही बदलती है ।। धधकती ……..
:- डाँ तेज स्वरूप भारद्वाज -:

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