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एक ग़ज़ल

बीते लम्हों को भी नादान चुराने निकले
लोग माज़ी के इस तरह दीवाने निकले ।
भूलना चाहा जिसे रश्मो रिवाजों की तरह
बातों-बातों मेंं कई और फसाने निकले ।
तरबतर रात थी जुगनू की रोशनी से वहाँ
खौफ में आग समझ लोग बुझाने निकले ।
शातिरे जुर्म को सरेराह देकर पनाह
फिर क्यों लाचार परिंदों को फसाने निकले ।
जोड़-तोड़ में ही बीती है जिंदगी जिसकी
देखिए आज वे फिर किसको मनाने निकले ।
कहीं कोई भी नहीं उनका मुन्तज़िर’अशोक’
क्यों फिर टूटे हुए रिश्तों को सजाने निकले ।
-अशोक सोनी
प्रगति नगर,भिलाई ।
मो.9406027423

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