Aug 31, 2016 · 1 min read

” उसको ही मंजिल मिलती है “

कविता-
” उसको ही मंजिल मिलती है ”

हार मान कर बैठ गए जो ,
कभी नहीं वो बढ़ते है ।
उसको ही मंजिल मिलती है ,
जो कठिन राह पत चलते है ।
नन्हीं चीटी धीरे-धीरे,
पर्वत चोटी लेती चूम ।
गिरती और सम्हलती क्रमशः,
नहीं देखती पीछे घूम ।
संघर्षों को आत्मसात कर,
पग में कभी न डरते है ।
उसको ही मंजिल……
तिनका-तिनका खोज-खोजकर,
चिड़िया अपना नीड़ बनाती ।
हार मान कर वह थकती जो ,
नन्हें चूजे कहाँ सुलाती ।
श्रम जो जिनका लक्ष्य भला ,
वह कहाँ कभी भी थकते है ।
उसको ही मंजिल ……
इसलिए अब चलो साथियों ,
सीखें अथक परिश्रम करना ।
यही हमारा मूल मंत्र हो,
सीखें हर पल मेहनत करना ।
जिसने भी इसको अपनाया ,
वो कभी न हारा करते है ।
उसको ही मंजिल……..

—प्रियांशु कुशवाहा, सतना (म.प्र)
मो. 9981153574

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