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Sep 18, 2017 · 1 min read

उलझे रिश्ते

शुरू करूँ किस कलम से,
मैं लिखना अपनी गुस्ताखियाँ ।
अब तो इन्तजार करती रहती हैं ,
रक्षाबन्धन पर राखियाँ ।।
सीधे-साधे भोले-भाले,
रिश्ते जलेबी बन गये ।
महज कुछ परदों(फोटो)में रह गईं,
भाई-बहन की झाकियाँ ।।

किस्मत का लेख है जो ,
जलेबी भी अब इमर्ती में तब्दील है।।
मिठास पूरी हैं मगर
दूरी है तो खामोशी है ।
पास हैं तो दलील हैं ।।

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