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उपन्यासकार पद्मभूषण ‘बनफूल’

पद्मभूषण में मूलनाम ‘बालाइ चंद्र मुखोपाध्याय’ है, न कि ‘बनफूल’ ! बिहार के मनिहारी (कटिहार) के हैं ‘बनफूल’। हालांकि अब वे पार्थव्य लोक में रहे नहीं! वे पेशे से ‘डॉक्टर’, किन्तु साहित्य-साधक थे। वे बांग्ला के महान उपन्यासकार थे। हाटे बजारे, भुवन शोम आदि दर्जनों उपन्यासों के लेखक बोनोफूल व बनफूल ने कई लेख, कविताएँ भी लिखा है।

1975 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से नवाजा। उस वर्ष ‘पद्मभूषण’ प्राप्तकर्त्ता की सूची में उनका नाम 10वें क्रम में था, किन्तु बोनोफूल व बनफूल नहीं, अपितु उनका मूल नाम ‘बालाइ चंद्र मुखोपाध्याय’ दर्ज है । पद्म अवार्ड की केटेगरी में उनका चयन ‘साहित्य और शिक्षा’ अंतर्गत हुआ था तथा वे ‘बिहार’ कोटे से चयनित हुए थे । यह कहना सरासर गलत है कि उनका चयन ‘प. बंगाल’ से था ! बिहार के ‘बोनोफूल’ को सादर नमन ! भारतीय डाकटिकट में उनका नाम ‘बलाइ चांद मुखोपाध्याय’ है। उनकी चचित कृतियां हैं- जंगम, रात्रि, अग्निश्वर, भुवन शोम, हाटे बजारे, स्थावर, लक्ष्मी का आगमन सहित 56 उपन्यास तथा लघुकथा के दो संगह तथा कविता आदि विविध विषयों पर अन्यान्य कृतियां।

लेखक श्रीमान विनीत उत्पल ने लिखा है, बंगाल के बहुचचित लेखकों में बनफूल यानि बलाईचांद मुखोपाध्याय शामिल हैं। मंडी हाउस स्थित वाणी प्रकाशन में किताबें टटोलते हुए उस दिन उनका 33वां उपन्यास ‘दो मुसाफिर’ पर नजर टिक गई। इस उपन्यास के घटनाक्रम में एक अलग स्थिति और माहौल घटित होता है। इस उपन्यास में अनोखापन तथा रोचकता भी है। बरसात की रात में नदी के घाट पर दो मुसाफिरों की मुलाकात होती हैं। उनमें से एक नौकरी की सिफारिश के लिए निकला हुआ युवक है, तो दूसरा रहस्यमय संन्यासी है। पानी से बचने तथा रात बिताने में बातों बात में उनके जीवन के विभिन्न अनुभवों के सीन उभरते हैं। उपन्यास के जरिए बेहतरीन संदेश देने का काम किया गया है। उपन्यास से एक बात उभरती है कि इस दुनिया में सभी मुसाफिर हैं। बिना एक दूसरे की मदद से मंजिल तक पहुंचना आसान नहीं होता है। बनफूल ने मानवता की बातें भी सामने रखी हैं। ‘दो मुसाफिर’ को पढ़ते वक्त भागलपुर की यादें ताजा हो जाती हैं। इसी शहर तथा इसके आसपास के इलाकों में बनफूल अपने जीवन का बेहतरीन समय बिताया था। भागलपुर रेलवे स्टेशन के घंटाघर की ऒर जाने वाली सड़क पटल बाबू रोड कहलाती है। आंदोलन के दौरान पटल बाबू ने फिरंगियों के विरूद्ध लड़ाई लड़ी थी। भारत के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू के काफी नजदीकी थे। राजेन्द्र बाबू ने अपनी आत्मकथा में उनके पटल बाबू (शायद ‘सरदार पटेल’ नहीं !) के बारे में काफी कुछ लिखा है।

इन्हीं पटल बाबू के मकान में कभी बनफूल का क्लिनिक हुआ करता था। आज भी यह मकान अपने अतीत को याद करते हुए सीना ताने खड़ा है। सफेद रंग के पुते इस मकान में फिलहाल सिंडिकेट बैंक चल रहा है जो रेलवे स्टेशन से घंटाघर जाते हुए अजंता सिनेमा हाल से थोड़ा पहले उसके सामने है। मुंदीचक मोहल्ले से शाह मार्केट जाने के रास्ते जहां पटल बाबू रोड मिलता है उसी कोने में यह मकान है। पटल बाबू के जीवन पर कभी कुछ लिखने की तमन्ना पालने वाला इन पंक्तियों के लेखक को जानकारी इकट्ठी करने के दौरान ‘बनफूल’ के बारे में जानकारी मिली थी। वहां रहने वाले पटल बाबू के संबंधी लेखक को उस कमरे में भी लग गए थे जहां बनफूल मरीजों को देखा करते थे। मकान के दो हिस्सों में बने बरामदे पर बैठ कर वे कहानी और उपन्यास की रचनाएं किया करते थे।

उपन्यास ‘दो मुसाफिर’ के पिछले पन्ने पर बनफूल की जीवनी को लेकर जानकारी दी गई है। तारीख 19 जुलाई 1899 को बिहार के कटिहार जिले के मनिहारी में जन्म। कोलकाता मेडिकल कालेज से डाक्टरी की पढ़ाई करने के बाद ‘बनफूल’ सरकारी आदेश पर आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए पटना गए। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे पटना मेडिकल कालेज एंड हॉस्पिटल और उसके बाद अजीमगंज अस्पताल में कुछ दिनों तक काम किया। बचपन से ही उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया था। उनका मन जंगलों में इतना लगता था कि उन्होंने अपना नाम ‘बनफूल’ ही रखा लिया। बाद में वे कहानी तथा उपन्यास भी लिखने लगे। मनोनुकूल परिस्थिति न मिलने के कारण उन्होंने नौकरी छोड़कर मनिहारी गांव के पास ही ‘दि सेरोक्लिनिक’ की स्थापना की। 1968 में उनहत्तर साल की अवस्था में मनिहारी और भागलपुर को हमेशा के लिए छोड़कर कोलकाता में बस गए। वहीं 1979 में उनका निधन हो गया। हालाँकि इस जीवनी में एकपक्षीय उद्भेदन है।

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