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ईश्वर के नाम पत्र भाग १

हे प्रभु !कहो तुम्हारा क्या हाल है ,
तुम कहाँ हो? हम हो रहे बेहाल हैं।

कहो? बैकुंठ का मौसम है कैसा ?
मृत्युलोक का मौसम ज़हर जैसा।

तुम्हारे वहां होता होगा नित्य आनंद,
मगर हम रहते ग़मों के पिंजरे में बंद ।

तुमने जो बनायीं दुनिया वैसी ना रहीं,
इस ओर देखने की फुर्सत भी न रही।

कहाँ हो, किघर छुपे हो कुछ तो कहो ?
हमारी हालत पर प्रभु ! ध्यान तो धरो।

तुम्हारे निरीह अंश प्रकृति,जिव-जंतु,
तुम मानव के कुकर्म पर मौन हो किंतु ।

कब तक और करवाओगे प्रतीक्षा तुम,
तुम्हारे विलंब से बड़े परेशान हैं हम ।

नित्य नयी विपदाओं से टूट चुके है हम,
अब तुम ही सहारा दो , हार चुके हैं हम।

लिखा हमने तुम्हें यह पत्र बड़ी आस से,
प्रतिउत्तर अवश्य दोगे यहीआशा आप से।

वेदना है हमारी यह नहीं कोई मामूली पत्र,
हमारा पत्र मिलते ही तुरंत देना जवाबी पत्र।

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