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18 Jan 2022 · 1 min read

आज़ाद गज़ल

ज़िंदगी भी कितनी बेशरम है
हमारे ही उम्मीदों पे क़ायम है।
सोंचिये कैसा है ये उम्रे सफ़र
मौत की तरफ़ बढ़ते कदम है ।
हवाओं ने संभाल रक्खा है हमें
हम सोंचतें साँसों का करम है ।
अपनी नजरों में है सब सिकंदर
दोस्तों यही तो हमारा भरम है ।
कोई किसी को कुछ नहीं देता
बस अल्लाह का सब पे करम है।
-अजय प्रसाद

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