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*** आज भी अट्हास करता है रावण ***

30.9.17 **प्रातः** 9.15

आज भी अट्हास करता है रावण
आज भी अट्हास करता है रावण
दसमुख है उसके दसों दिशाओं में
खुले हैं करते ग्रास सब मनभावन
मानव-मन पाता है त्रास हर-दम
दम निकल जाये कब माना मानव
भूख गरीबी अबलाओं का प्रतारण
भ्रष्ट-नेता-चाकर-पथभ्रष्ट हो मानव
दानवसंज्ञा पाता मनपापी हो मानव
रोता रावण पैदा होता होता मानव
जीवन खो-ता होता पथ में पागल
सोता देख मानव कुम्भकरण-पागल
आलस फैला करता-2 मन-घायल
बजती चाहे मनमस्तिष्क में पायल
होता सुन मन-शोर मेघनाद घायल
आहत करता मन में रखता चाहत
अरे शोर चारो ओर सुन हो पागल
आज भी अट्हास करता है रावण
आज भी अट्हास करता है रावण
करते उसको हम खुद खड़ा हो वो
चाहे नेता या बुत- कागज़ -रावण
जल-जला जाता है ये बुत- रावण
जलते नहीं ये चमड़े के बुत-रावण
जो देते है त्रास ये तन-मन-मानव
हम खड़े कर देते परवर्ष ये रावण
होगा शायद दहन इनका इकदिन
इकदिन होगी होगी धरती पावन
आज भी अट्हास करता है रावण
आज भी अट्हास करता है रावण ।।
?मधुप बैरागी

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