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आजकल की बहुएँ

लघुकथा-आजकल की बहुएँ

“मम्मी जी,चाय बना दूँ क्या आपके लिए?” ड्यूटी से अभी अभी लौटी सुधा ने हाथ मुँह धोकर किचन का रुख किया।आज ऑफिस में बहुत काम था।वह थक गयी थी और आराम करना चाहती थी।पर….
“हाँ,अदरक वाली बनाना और उनसे भी पूछ ले।चाय को तो मना कर रहे थे शायद।” “पापा जी आप के लिए क्या बनाऊँ?चाय पियेंगे क्या”
“नहीं बेटा,मेरे लिए तो तू टमाटर का सूप बना दे।”
“मम्मी!दादी के लिए चाय बना रही हो तो साथ में मेरे लिए आलू के पकौड़े बना दो,बड़ा मन कर रहा है पकौड़े खाने का”राशि ने टीवी देखते हुए आवाज लगायी।
“अब तू भी बता दे रमन तुझे क्या खाना है?”
“आपने प्रॉमिश किया था कल बर्गर का,याद है न बस अपना प्रॉमिश पूरा कर दो।”
“बेटा अभी तू भी राशि के साथ पकौड़े ही खा ले।बर्गर फिर किसी दिन बना दूँगी।”
“अरे कैसी माँ है,बच्चे की एक फरमाइश पूरी नहीं कर सकती वैसे भी सुबह ड्यूटी जाते समय तो ऐसे ही उल्टा सीधा टिफिन तैयार करती है एक शाम को ही बच्चे फरमाइश करते हैं।आ बेटा रमन,दादी बनायेगी अपने बच्चे के लिए बर्गर”कमरे में बैठे बैठे ही दादी ने बात सुनायी।
सुधा के पास अब सबके अपने अपने विकल्प थे पर वह क्या चुने इसका कोई विकल्प नही था।अन्दर से सासू जी की आवाज आ रही थी,”अरे आजकल की बहुएँ तो दो लोगों का चाय नाश्ता बनाने में थक जाती हैं।एक हम थे दस दस लोगों की रोटियाँ बनाते थे।”

✍हेमा तिवारी भट्ट✍

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