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आखिर मेरा लल्ला फिर घर आएगा! उम्मीदों का ताज फिर से पहनाएगा!!

आख़िर मेरा लल्ला फिर घर आएगा!
उम्मीदों का ताज फिर से पहनाएगा!!

इन्तजार हैं इस चौखट पर,
कल मेरा लल्ला फिर घर आएगा!
थक चुकी हैं आँखे,
मगर उम्मीद बाँधने फिर आएगा!
इश्क़ की उठती इन लपटों में,
जो पागलपन का दौरा पड़ा हैं!
वो भूल गया हैं खुद को,
अब कैसे इस अबला को रब बनाएगा!!

आख़िर मेरा लल्ला फिर घर आएगा!
उम्मीदों का ताज फिर से पहनाएगा!!

वो कह गया था कि,
जग में नाम ऊँचा तेरा करवाएगा!
वो रख गया जुबा कि,
फिर से अपना घर बनवाएगा!
मगर इश्क़ की मदिरा पीकर,H
आँखों से अन्धा हो गया
जो भूल चूका है नाम उस अबला का,
वो कैसे फिर से ‘माँ’ कहलाएगा!!

आख़िर मेरा लल्ला फिर घर आएगा!
उम्मीदों का ताज फिर से पहनाएगा!!

–सीरवी प्रकाश पंवार

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