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आँख का पानी ढला

?आँख का पानी ढला?

गयी है सूख भावनाओं की नहर
हो गया है रेतीला-सा हर पहर
आँख का पानी ढला,पर गया किधर

आदमी यहाँ कोई जिन्दा नहीं
रिश्तों की भी सीढियाँ हीं बनी
सीढ़ियों से पटा हुआ रहे शहर
आँख का पानी ढला,पर गया किधर

अपनी अपनी ढपली,अपने राग हैं
मेमने की खोल ओढ़े,बाघ हैं
धुँधली प्रपंच से हुई है नज़र
आँख का पानी ढला,पर गया किधर

झूठ किसको माने,सच किसे कहें
शब्द चाशनी से थे सब सने हुए
दृश्य में भी,देखो तिलिस्म का असर
आँख का पानी ढला,पर गया किधर।
✍हेमा तिवारी भट्ट✍

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