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अवधी की आधुनिक प्रबंध धारा: हिंदी का अद्भुत संदोह

समीक्ष्य कृति- अवधी की आधुनिक प्रबंध धारा: हिंदी का अद्भुत संदोह
लेखिका – डाॅ ज्ञानवती दीक्षित
प्रकाशक- देशभारती प्रकाशन,दिल्ली-93
प्रकाशन वर्ष-2019, मूल्य- 850/- रुपये (सजिल्द)
अवधी की आधुनिक प्रबंध धारा: हिंदी का अद्भुत संदोह, एक समीक्षात्मक प्रबंध है, जिसे लेखिका ने लगभग तीस वर्ष के अथक परिश्रम से तैयार किया है।हिंदी साहित्य की इस अनमोल थाती के विषय में कुछ भी लिखने से पूर्व पाठकों के लिए ‘संदोह’ शब्द को स्पष्ट करना आवश्यक है।संदोह शब्द का अर्थ है- दूध दुहना, झुण्ड, समूह,प्रचुरता आदि।इस शब्द के अर्थ से स्पष्ट होता है कि प्रस्तुत समीक्षापरक ग्रंथ हिंदी का एक ऐसा अद्भुत ग्रंथ है जिसमें अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों की समस्त सामग्री को एक स्थान पर समेटकर रख दिया गया है।यह एक ऐसा प्रकाश पुंज है जिससे अवधी की आधुनिक प्रबंध धारा हिंदी साहित्य में अलग से झिलमिलाती हुई दिखाई देती है।इस अद्भुत ग्रंथ को लेखिका ने अपने गुरु अवधी के स्वनामधन्य कवि समृतिशेष डाॅ श्याम सुन्दर मिश्र ‘मधुप’ जी को समर्पित किया है।
प्रस्तुत समीक्षात्मक शोध ग्रंथ को सात अध्यायों में विभक्त किया गया है । ये अध्याय हैं-अवधी के प्रबंध- काव्यों की परंपरा, अवधी के आधुनिक प्रबंध-काव्यों का सामान्य परिचय, अवधी के आधुनिक प्रबंध-काव्यों की प्रमुख प्रवृत्तियाँ, अवधी के आधुनिक प्रबंध-काव्यों में वस्तुवर्णन,अवधी के आधुनिक प्रबंध-काव्यों का अनुभूति पक्ष,अवधी के आधुनिक प्रबंध-काव्यों का अभिव्यक्ति पक्ष और अवधी के आधुनिक प्रबंध-काव्यों में महाकाव्यत्व।
अवधी के प्रबंध काव्यों की परंपरा नामक प्रथम अध्याय में लेखिका ने प्रबंध काव्य की विभिन्न संस्कृत विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं का उल्लेख करते हुए साहित्यदर्पणकार आचार्य विश्वनाथ की परिभाषा को सर्वमान्य ठहराते हुए अवधी के प्रबंध काव्यों को कसौटी पर कसा है।इतना ही नहीं लेखिका ने इस प्रबंध काव्य परंपरा के भेदों का भी निरूपण करते हुए उन्हें प्रेमाख्यानक-काव्य- परंपरा, राम-काव्य-परंपरा और अवधी की कृष्ण-काव्य-परंपरा का उल्लेख किया है।इस अध्याय में विदुषी लेखिका ने न केवल अवधी के उत्कृष्ट प्रबंध- काव्यों का परिचय दिया है वरन इस बात को बड़ी गंभीरता से प्रतिपादित किया है कि हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों एवं समीक्षकों ने अवधी के प्रबंध काव्यों को वह महत्व नहीं दिया जो हिंदी साहित्य को समझने के लिए एवं उसकी श्रीवृद्धि करने वाले इन ग्रंथों के लिए आवश्यक थी।इन सभी से अवधी के महान कवियों को सदैव उपेक्षा ही मिली।
द्वितीय अध्याय, ‘अवधी के आधुनिक प्रबंध-काव्यों का सामान्य परिचय’ में लेखिका ने अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों की सूची दी है,जिसमें माधव सिंह क्षितिपाल के रघुनाथ चरित,लवकुश चरित एवं सीता स्वयंवर, प्रकाशन वर्ष 1885-1887 से लेकर आध्यात्मिकता प्रसाद सिंह ‘प्रदीप’, प्रकाशन वर्ष 2018 तक 82 ग्रंथों का उल्लेख किया है।तत्पश्चात उन समस्त ग्रंथों की विषयवस्तु का वर्णन भी दिया गया है। इतने सारे ग्रंथों का संकलन और उनका अध्ययन कर उसकी विषयवस्तु, भावपक्ष और कलापक्ष को समझना निश्चित रूप से एक श्रमसाध्य कार्य है।सबसे अधिक कठिनाई तो इन ग्रंथों और ग्रंथकारों के विषय में जानकारी इकट्ठा करने में आई होगी फिर इन प्रकाशित और अप्रकाशित ग्रंथों को प्राप्त करना भी सहज नहीं रहा होगा।82 ग्रंथों में से 32 ऐसे ग्रंथ हैं जो कि अप्रकाशित हैं। इन ग्रंथों की पांडुलिपियों को प्राप्त करना बहुत मुश्किल रहा होगा।सहज रूप में इसका अनुमान लगाया जा सकता है।लेखिका ने असंभव से लगने वाले कार्य को अंजाम तक पहुँचाया इसके लिए उन्हें कोटिशः नमन।
अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों की प्रमुख प्रवृत्तियाँ नामक तृतीय अध्याय में लेखिका ने सर्वप्रथम प्रवृत्तियों को दो भागों- परंपरागत प्रवृतियां और नवीन प्रवृत्तियाँ दो भागों में विभक्त किया है तत्पश्चात पारंपरिक प्रवृत्तियों को, भक्ति काव्य, नीति काव्य और बरवै काव्य नामक उपभेदों को उदाहरण सहित स्पष्ट किया है।नवीन प्रवृत्तियों के अंतर्गत आधुनिक हिंदी काव्य की उन प्रवृत्तियों का उल्लेख किया है जो कि अवधी और हिंदी दोनों में समान रूप से दृष्टिगत होती हैं; जैसे- छायावाद, रहस्यवाद, सामाजिक तथा सांस्कृतिक काव्य,राष्ट्रीय काव्य और प्रगतिवादी काव्य प्रवृत्तियाँ।अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों में प्राप्त ग्राम्य-प्रकृति तथा ग्रामीण जीवन की जो झाँकी इन ग्रंथों में प्रस्तुत की गई है उसका भी विशद विवेचन किया गया है।
किसी भी भाषा के प्रबंध काव्य के लिए उसका वस्तु वर्णन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है अर्थात वस्तु वर्णन पर ही उसके भाव पक्ष का सौष्ठव अवलंबित रहता है। इस ग्रंथ के चतुर्थ अध्याय ‘अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों में वस्तु वर्णन’ में वस्तु निरूपण को दो भागों में बांटा गया है- प्राकृतिक दृश्यों का चित्रांकन और मानवीय रूप ,जीवन और युद्धों के वर्णन। लेखिका का स्पष्ट मत है कि हिंदी के समस्त प्राचीन और नवीन काव्य में प्रकृति चित्रण के जितने भी रूप दृष्टिगोचर होते हैं, वे प्रायः सभी रूप अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों में प्राप्य हैं; जैसे कि आलंबन रूप में प्रकृति चित्रण, मानवीकरण रूप में प्रकृति चित्रण, परम तत्त्व के दर्शन के रूप में प्रकृति चित्रण, संवेदनात्मक रूप में प्रकृति चित्रण, प्रतीकात्मक रूप में प्रकृति चित्रण, उद्दीपन रूप में प्रकृति चित्रण, आलंकारिक रूप में प्रकृति चित्रण, उपदेशिका रूप में प्रकृति चित्रण और नाम परिगणनात्मक शैली में प्रकृति चित्रण। इन विभिन्न विभेदों का सोदाहरण विस्तारपूर्वक विवेचन करने के उपरांत मानवी रूप,जीवन और युद्ध के वर्णन पर प्रकाश डाला गया है।
पंचम अध्याय, अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों का अनुभूति पक्ष में भाव अथवा रस को काव्य की आत्मा मानते हुए संस्कृत साहित्य के विभिन्न आचार्यों- नाट्यशास्त्रकार भरत मुनि, दशरूपककार धनंजय,काव्यादर्शकार दण्डी, ध्वन्यालोककार आचार्य अभिनवगुप्त, साहित्यदर्पणकार आचार्य विश्वनाथ के मतों का उल्लेख किया है।लेखिका के अनुसार ‘रसों का आधार भाव है।भावों की परिपक्वावस्था ही रस है।’ इस अध्याय में अवधी के आधुनिक प्रबंध कारों ने किस कुशलता के साथ श्रृंगार, हास्य, करुण,रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत,शांत और वात्सल्य रस का प्रयोग अपने-अपने प्रबंध काव्यों में किया है, का विवेचन किया गया है।
‘अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों का अभिव्यक्ति पक्ष’ नामक षष्ठ अध्याय में लेखिका ने भाषा-शैली,अलंकार विधान और छंद विधान का विवरण प्रस्तुत किया गया है। अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों की भाषा शैली तीन प्रकार की है- संस्कृत गर्भित भाषा शैली, सहज सरल भाषा शैली और आंचलिकता के संस्पर्श को लिए नवीन भाषा शैली। भाषा-शैली के साथ लेखिका ने काव्य-गुणों- माधुर्य, ओज और प्रसाद गुण के साथ-साथ प्रतीक योजना, लाक्षणिक विधान, चित्रात्मकता के आधार पर परखने का प्रयास किया है।अवधी के प्रबंधकारों ने मुख्य रूप से दोहा,चौपाई,सोरठा,बरवै,रोलां,उल्लाला, छप्पय,सार, कुंडलिया वीर चौपइया आदि मात्रिक ; कवित्त, सवैया, बसंततिलका,भुजंग प्रयात,दंडी त्राटक, धामर , मालिनी आदि वर्णिक छंद; सोहर,लहचारी, कजरी ,बिरहा, लावणी,होरी आदि लोकगीतों की शैली तथा ग़ज़ल, रुबाई आदि उर्दू छंदों का प्रयोग अपने प्रबंध काव्यों में किया है।
समीक्ष्य कृति के अंतिम अध्याय अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों में महाकाव्यत्व का विवेचन किया गया है। लेखिका ने सर्वप्रथम महाकाव्य के स्वरूप तथा उसके अनिवार्य और गौण तत्त्वों की कसौटी पर अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों को कसा है।इसके लिए संस्कृत आचार्य भामह,दण्डी और आचार्य विश्वनाथ के मतों को आधार बनाया गया है।लेखिका ने पाश्चात्य साहित्य शास्त्र की दृष्टि में महाकाव्य क्या है, को जानने के लिए अरस्तू एवर क्रौम्बी, सी एम गेले,सी एम बाबरा, डब्ल्यू पी केर, वाल्टर पेटर और मैकलीन डिक्शन आदि विद्वानों के मतों को खँगाला है।हिंदी साहित्य में महाकाव्य संबंधी धारणा को समझने के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी, डाॅ शंभूनाथ सिंह, डाॅ गुलाब राय,डाॅ गोविंद राम शर्मा, डाॅ बनवारी लाल शर्मा का उल्लेख किया गया है।लेखिका ने अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों के अंतर्गत जिन 82 ग्रंथों का उल्लेख किया है, को सामान्य प्रबंध काव्य,सामान्य खंडकाव्य, सामान्य प्रेमाख्यानक काव्य,अच्छा प्रबंध काव्य,उत्कृष्ट और सरस प्रबंध काव्य, निबंध काव्य आदि में श्रेणीबद्ध किया है।इसके अतिरिक्त लेखिका ने लक्षणों के आधार पर अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों का, प्रमुख महाकाव्य, महाकाव्याभास वृहत् प्रबंधकाव्य, महाकाव्याभास सामान्य प्रबंध काव्य, महाकाव्याभास जीवनी काव्य ,महाकाव्याभास संकलनात्मक प्रबंध काव्य रूप में वर्गीकरण किया है, जो कि अपने आप में एक विवेचनात्मक दृष्टि की अपेक्षा रखता है।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि लेखिका ने इस समीक्षात्मक शोध ग्रंथ को तैयार कर अवधी भाषा के साथ-साथ हिंदी साहित्य के कोश में श्रीवृद्धि कर एक उल्लेखनीय कार्य किया है।आपके इस योगदान के लिए अवधी और हिंदी साहित्य में आपका नाम सदैव आदरपूर्वक लिया जाएगा।बड़े और महत्वपूर्ण कार्य सहज रूप में सम्पन्न नहीं होते, उनके लिए कठिन एवं अथक परिश्रम की आवश्यकता होती है।लेखिका ने अपने पूर्ववाक में इस बात का उल्लेख किया है कि इस ग्रंथ को तैयार करने में तीस वर्ष का समय लगा,तो इसको स्वीकार करने में किसी को कोई हिचक नहीं हो सकती, क्योंकि इतने अधिक कवियों और उनकी कृतियों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने और उन्हें प्राप्त करने में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं इन ग्रंथों का अध्ययन कर विभिन्न आधारों पर उन्हें जाँचना-परखना भी आसान नहीं रहा होगा।यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि जहाँ हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों एवं समीक्षकों ने ने कभी भी अवधी भाषा में रचे जा रहे महान ग्रंथों की ओर दृष्टि नहीं डाली, हिंदी साहित्य में अवधी के योगदान को उपेक्षित किया वहीं डाॅ ज्ञानवती दीक्षित जी ने अवधी के आधुनिक प्रबंध काव्यों के संबंध में समीक्षा ग्रंथ लेखन का जो महनीय कार्य किया है वह हिंदी एवं अवधी साहित्य के शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत उपयोगी होगा।यह एक जानकारीपूर्ण संग्रहणीय ग्रंथ है, जो हमें न केवल अवधी कवियों की प्रतिभा से परिचित कराता है अपितु अवधी के गौरव में भी अभिवृद्धि करता है।अवधी की आधुनिक प्रबंध धारा :हिंदी का अद्भुत संदोह समीक्षा ग्रंथ की लेखिका को मेरी ओर से अशेष शुभकामनाएँ।
डाॅ. बिपिन पाण्डेय
रुड़की( उत्तराखंड)

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