अभी धैर्य समाप्‍त नहीं हुआ है

‘नारायण——नारायण ।’
ब्रह्मलोक में नारदमुनि के स्वर को सुन कर कमलासन पर ध्यानस्थ ब्रह्माजी ने मुसकराकर उन्हें देखा और कहा- ‘आओ नारद, कैसे कष्ट किया?’
‘प्रभु, मनुष्य‍ की गुहार ले कर आया हूँ। कष्ट तो पृथ्वीलोक में प्रजा भुगत रही है। घोर अन्याय हो रहा है, आप से कुछ छिपा नहीं है?’ ऐसा नहीं हो सकता अब आप सृष्टि का नव निमार्ण रोक दें।’
‘मेरे लोक में निर्माण में कोई भेदभाव नहीं। जहाँ तक प्रजा का प्रश्न है, प्रजा तो संस्कारों के अधीन कर्मप्रवण है। वर्गभेद, छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे का भेद या अन्तर तो मानव के संस्कारों से निर्मित हैं। इसमें मैं क्या, कर सकता हूँ। मेरा कार्य तो जगत् में संतुलन बनाये रखने के लिए यमलोक में मृत्यु की प्रविष्टि के आधार पर है। यह भरण-पोषण से उत्पेन्न संवेग हैं। यह विष्णु और विष्णुप्रिया लक्ष्‍मी का कार्यक्षेत्र है, इसमें मैं अतिक्रमण नहीं कर सकता और किसी भी जीव का जन्म होने पर, मैंने उसके परिवार में उन्हें प्रसन्न होते ही देखा है, कोई भी जीव दु:खी नहीं।’ ब्रह्मा ने गंभीरता से कहा।
नारद विष्णुलोक पहुँचे। शेषशैया पर श्री और श्रीपति को पाकर वे उनका गुणगान करने लगे। उनका ध्यान आकर्षित कर, वे उन्हें प्रणाम करने लगे। विष्णु ने उनका अभिनंदन किया और कहा- ‘आओ मुनिश्रेष्ठ, अवश्य ही पृथ्वी लोक से लौट रहे हैं, सुनायें कुछ नये समाचार।’
‘जनार्दन, बहुत उथल पुथल हो रही है पृथ्वीलोक में। भ्रष्टाचार चरम पर है। क्षमा चाहूँगा, श्रीदेवी की कुछ लोगों पर कुछ ज्यादा ही कृपा बरस रही है।’ उन्होंने लक्ष्मी की ओर देख कर श्रद्धा से सिर नवाते हुए कहा। लक्ष्मी भी मुसकरा कर रह गयीं।
नारायण बोले- ‘मुझसे कोई काम हो तो बतायें।’
‘प्रभु, प्रजा महँगाई से त्रस्त है, जीवन-यापन दुष्कर होता जा रहा है, आप के होते हुए वे तंगी में जी रहे हैं।’
‘मुनिराज, जहाँ तक मेरी दृष्टि जा रही है, कोई भी जीव भूखा उठता अवश्य है, पर मैं उसे भूखा सुलाता नहीं हूँ, अपवाद स्वरूप कोई एक दो हों तो बात अलग है, मेरे चर अभी तक ऐसा कोई उदाहरण मेरे पास नहीं लाये। शेष तो उनके कर्मों के आधार पर उनके साथ न्याय हो रहा है। मेरा कार्य पालन-पोषण का है। पालन तो मुझे सम्पूर्ण जीव-जगत् का करना है, उसमें मनुष्य भी हैं। पोषण परिवार का ही करूँगा न, यह परिवार का दायित्व है कि वह किस साधन-संसाधन से उसका निर्वाह कैसे करते हैं?’
देवी लक्ष्मी की ओर इंगित करते हुए उन्होंने कहा- ‘श्री भी उनके कर्मों के अनुसार ही उनका भरण करती है, उसके लिए कोई भी बड़ा या छोटा, अच्छा या बुरा नहीं, वह तो चंचला है, किसी से उसको मोह नहीं।’ नारायण ने नारद से कहा- ‘कर्म संस्कारों से बँधे हुए हैं। संस्कार से ही व्यक्ति कर्मप्रवण बनता है। मनुष्य को छोड़ कर शेष प्राणियों की कभी भी कोई आलोचना मेरे पास नहीं आई। आप जब भी मेरे पास आते हैं, प्रजा का ही चिट्ठा ले कर आते हैं, जबकि मैं जहाँ तक जानता हूँ, ब्रह्माजी ने तो सबसे बुद्धिमान् मनुष्य को ही बनाया है और वह ही असंतुष्ट है, यह जान कर आश्चर्य होता है?’
‘अच्‍युत, आप तो सर्वशक्तिमान् है। जो हो रहा है, आप की दृष्टि से छिपा नहीं। लगता है अपनी बुद्धि और बल से मनुष्य ने आपके अधिकारों का भी थोड़ा-थोड़ा अतिक्रमण कर लिया है।’ नारद ने चुटकी ली।
‘इसका दण्‍ड तो दण्डसंहिता के अनुसार महाकाल के कार्यक्षेत्रानुसार तय है।’ विष्णु ने संयत हो कर प्रत्युत्तुर दिया।
नारद बोले- ‘सत्य नारायण, एक अंतिम प्रश्‍न प्रभु, क्या कोई नये अवतार के आसार नहीं हैं?’
‘नहीं, मुनिवर, अभी देवलोक से ऐसी कोई निविदा प्राप्त नहीं हुई है। जगत्सृष्टा ब्रह्मा और महाकाल शिव की समाधि में अभी कोई विघ्न पैदा नहीं हुआ है। मनुष्य और पृथ्वी का अभी धैर्य समाप्त नहीं हुआ है, आप चिन्ता नहीं करें, मानव को अभी भी अवसरों की कमी नहीं है, बस वह कर्मप्रवण के साथ-साथ संस्कार प्रवण भी बने, तो स्थिति में सुधार हो सकता है।’
‘नारायण—-नारायण।’ नारद नमन् कर विष्णुै लोक से जाने के लिए खड़े हुए। विष्‍णु ने कटाक्ष किया। पूछा- ‘अब कहाँँ मुनिवर, क्‍या शिवलोक में जाने का अभियान है?’
अरे, नहीं नारायण, अभी केदारनाथ की त्रासदी के बारे में आपको ज्ञात हुआ ही होगा। प्रकृति का रौद्ररूप और मानवक्षति का जो दृश्‍य देख कर लौटा हूँ, अवर्णनीय है। ऐसे में भी, उस कालजयी की योगनिद्रा नहीं टूूटी प्रभुु, वहाँँ जाना अभी उचित नहीं होगा।’

विष्‍णु मुसकुराकर रह गये। नारद नमन कर विष्‍णुलोक से विदा हुए और पृथ्वी लोक पर आकर उन्होंने प्रजा को उनका संदेश सुना दिया।

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