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अब पछताये होत क्या,

अब पछताये होत क्या,
जब चिड़ियाँ चुग गई खेत l
उँगलियों बिच दरारें,
क्यों हाथों में थामी रेत l

धरा पर पड़ी जल की बूंदें,
न पायेगा समेट l
जीवन से लगा लेते,
खुश होते सफलता लेत l

बेचैन करते. दिन व रैन,
प्यास के पनपे खेत l
अब पछताये होत क्या,
जब चिड़ियाँ चुग गई खेत l

अरविन्द व्यास “प्यास”
व्योमत्न

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