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अपने नज़रिए की खिडकी

चलो आज
अपने नज़रिए की
खिडकी के कांच साफ़ करते है

बचपन मे यह
खिड़की की कांच कोरी
साफ़ सुथरी थी

गलत मान्यताएं
कटु अनुभव, अपेक्षाओं ने
कांच को मटमैला कर दिया

आज इसे साफ करते है
कुछ नई आदतें बनाते है
कुछ पुरानी आदते छोड़ते है

कुछ ध्यान करते है
कुछ मनन करते हैं
आज ही नज़रिए की खिड़की
साफ करते है

संकल्प के साथ
असंभव, संभव हो जाता है
आज नई दृष्टि से संसार को देखें
अपना कांच साफ करें…

– प्रो.दिनेश किशोर गुप्ता ( आनंदश्री )

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