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Nov 19, 2016 · 1 min read

अनकही

छीन मेरे अधिकारो को
बोलो तुमने क्या पाया
साथी बन यूं साथ चले
साया भी साथ न आया

पलट गया समय आज
अब हम से तू मैं हुये हैं
भावों से अंजान हैं दोनों
क्यूं राह एक चले हैं

भरी हुई आंखें खाली हैं
गूंगी बन गई भाषा
बोलो से मोहताज निराशा
थक गई अब आशा।

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