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अनकही बातें

कहने को यूँ दिल में थीं
होंठों पर ठहरी हुईं
कुछ अनकही बातें

लफ़्ज़ों में पिरोई हुई
कागज़ पर उतरी नहीं
हुईं दफ़न सीने में कही
कुछ अनकही बातें

ख्वाबों के सहारे चलते रहे
हम उनसे मिलते बिछड़ते रहे
कई बार कहने को हुईं
पर भीड़ में कहीं दब सी गयीं
कुछ अनकही बातें

सोचता हूँ स्याही का रंग देकर
कागज़ पर उकेरता रहूँ
कि उन तक पहुंचे खतों में कभी
मेरी अनकही बातें

–प्रतीक

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