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अक्स

कुछ समय पहले उसकी तस्वीर देखी थी चेहरा साफ था बाल घुंघराले थे बड़ी बड़ी आंखे मानो बोल उठेगी सहज मुस्कान लिये थी समय बीतता गया एक दिन दफ्तर से आते वक्त अंधेरे को चीरती रोशनी में एक अक्स दिखा बहुत कुछ मिलता जुलता लगा यों जैसे मेरी निजी सोच का परिणाम हो मैं बस स्टाप पर हर आने वाली बस में अपने गंतव्य को देख रहा था गरजते बादलों में बिजलीचमक रही थी वो अक्स जो अब तक अंधेरे में था स्टाप की सीमाओं में आ चुका था पल भर में ही सारा शहर भीग गया ।पानी को धकेलती चीरती कीचड़ में लथपथ एक बस सामने आ खड़ी हुई मैं और वो अक्स अब बस के अंदर थे अक्स इसलिए क्योंकि अभी तक मैं उसका चेहरा नहीं देखा था किंतु मेरी स्मृति के अनुसार वो वैसा ही होगा ऐसा प्रतीत हो रहा था वो मुझसे आगे थी जब तक मैं आगे बढ़ता उसके पीछे दो एक लोग आ चुके थे चेहरा अभी भी नहीं देख पाया था सहसा उसने बायीं ओर से गुजरती मीनार की तरफ गर्दन घुमाई उसके बालों से निकलता उसका चेहरा अभी भी नहीं दिखा क्योंकि उसी वक्त साथ की सीट पर बैठा यात्री खड़ा हो गया बस अब तक स्पीड़ पकड़ चुकी थी।मेरे और उसके बीच चार पांच फर्लांग का फासला आ चुका था पर उसे पल भर देखने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी सोचा पीछे से पुकार लूं पर यह उचित न लगा सहसा बस झटका खाते हुई तीन चार स्टाप पार कर चुकी थी कौतुहलता हर पल थी सामने स्टैंड आया मैं पीछे से आने वाले यात्रियों को देखने लगा क्योंकि पीछे की ओर किसी बात पर वाद विवाद हो हा था बस कुछ रूककरआगे बढ़ी मैं भी भीड़ को चीरता आगे की तरफ बढ़ रहा था पर वहां वो अक्स नहीं था मैंने खिड़की से झांककर पीछे गुजरती सड़क पर देखा वही अक्स पीछे की ओर कहीं बढ़ता गया और पल भर में औझल हो गया।

मनोज शर्मा

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