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Author: त्रिलोक सिंह ठकुरेला

त्रिलोक सिंह ठकुरेला
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त्रिलोक सिंह ठकुरेला कुण्डलिया छंद के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं.कुण्डलिया छंद को नये आयाम देने में इनका अप्रतिम योगदान है.

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

गांव तरसते हैं…

सुविधाओं के लिए अभी भी गांव तरसते हैं। सब कहते इस [...]

आशाओं की कस्तूरी…

1. कोसते रहे समूची सभ्यता को बेचारे भ्रूण 2. दौड़ाती [...]

कुछ दोहे…

फँसी भंवर में जिंदगी, हुए ठहाके मौन । दरवाजों पर बेबशी, टांग [...]

कब आओगे

अनगिनत दुःशासन चीरहरण करते वसुधा का, आँचल रोज सिमटता [...]

देश हमारा

सुखद, मनोरम, सबका प्यारा। हरा, भरा यह देश हमारा॥ नई सुबह ले [...]

कुण्डलिया कैसे लिखें…

त्रिलोक सिंह ठकुरेला जी द्वारा -- "कुण्डलिया कैसे [...]

प्रिये ! मैं गाता रहूंगा…

यदि इशारे हों तुम्हारे, प्रिये ! मैं गाता रहूंगा. प्रेम-पथ का [...]

समय की पगडंडियों पर

समय की पगडंडियों पर चल रहा हूँ मैं निरंतर कभी दाएँ , कभी [...]

पिता

पिता ! आप विस्तृत नभ जैसे, मैं निःशब्द भला क्या बोलूं. देख [...]

कुण्डलियाँ

अपनी अपनी अहमियत, सूई या तलवार । उपयोगी हैं भूख में, केवल [...]