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Author: Sushant Verma

Sushant Verma
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विधाएं

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गज़ल/गीतिका (9 Posts)


दम तोड़ती भुखमरी

आसरा हो जो तेरे दीदार का है इलाजे मर्ज़ इस बीमार का पा [...]

ऑंखें

जाने क्या ये पिला गईं आँखें इक नशा सा चढ़ा गईं आँखें मौन थे वो [...]

दिल का वीरां नगर

जो तुम तीरगी रहगुज़र देख लेना जला मैं मिलूँगा ठहर देख [...]

किताबी जीवन

ये जीवन किताबी जिये जा रहे हैं वरक़ रोज़ सादे जुड़े जा रहे [...]

सिमटी ख्वाईश

क्या कमी बोलो ज़िन्दगी की है ख़ुद बुने जाल में ये उलझी है छोड़ [...]

बसे हो दिल में

कितना कुछ कहना रहता है लब तक आ ठहरा रहता है कह कर तुमको खो न [...]

इंसान का मजहब

बैठे सब खुद का लिये किसको सुनाया जाए अपना गम लेके कहीं और न [...]

मैं एक दरिया हूँ

है हासिल जो वो भी थोड़ा नहीं है ये भी बहुतों ने तो पाया नहीं [...]

एक ग़ज़ल

यूँ ज़िन्दगी तू मुहाल मत कर इसे तू ख़्वाहिश का जाल मत कर रहेगा [...]