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Author: suresh chand

suresh chand
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जन्म -12 जुलाई 1972 को ग्राम व पो. जंगल चवँरी, थाना खोराबार, जिला-गोरखपुर (उ.प्र.) में । शिक्षा- एम.ए. (हिन्दी) तथा एल.एल.बी.। बाँसुरी एवं तबला से संगीत प्रभाकर। प्रथम काव्य संग्रह 'हम उन्हें अच्छे नहीं लगते' वर्ष 2010 में प्रकाशित। संप्रतिः भारतीय जीवन बीमा निगम, शाखा सी.ए.बी., बक्शीपुर, गोरखपुर में सहायक प्रशासनिक अधिकारी के पद पर कार्यरत। email: suresh.kavi.lic@gmail.com ; मोबाइल +919451519473

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हम उन्हें अच्छे नहीं लगते (कविता)

इस शस्य श्यामला भारत भूमि की हर चीज उन्हें अच्छी लगती है [...]

गरीब का दुःख (कविता)

गरीब के श्रम से बनी है दुनिया और उनके दुःख से चलती है देश की [...]

बेटी- तीन कवितायें

(एक) बेटी सबसे कीमती होती है अपने माँ-बाप के लिए जब तक वह घर [...]

हिन्दी जन की बोली है (गीत)

हिन्दी जन की बोली है हम सब की हमजोली है खेत और खलिहान की [...]

ओ काली घटा (गीत)

ओ काली घटा मेरे आँगन आ तू मेरी सहेली बन जा रे ! है सूखी धरती, [...]

एक गीत लाया हूँ मैं अपने गाँव से (गीत )

एक गीत लाया हूँ मैं अपने गाँव से। धूल भरी पगडण्डी पीपल की [...]