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Author: S Kumar

S Kumar
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मैं वो लिखता हूँ, जो मैं महसूश करता हूँ, जो देखता हूँ, कभी कभी अपने ही शब्दों में खुद को ढूंढ़ता हूँ, हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करता हूँ, बस कुछ ऐसा ही हूँ मैं, ठहरता नहीं हूँ, मैं चलता रहता हूँ ।। कुमार हरियाणा की माटी से जुड़ा एक कलाकार लिखने के साथ साथ अभिनय और निर्देशन में भी रूचि है ।

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

जमाने की पोल… हरियाणवी रागनी

ढ़के हैं तो ढ़के रहण दे, तू ढ़के रहण दे ढ़ोल ना खुलवावे तू ना [...]

मुझे फूल नहीं, कांटा बनना है

सच ही तो कहतें हैं, बाग में सबसे पहले वही फूल टूटता है, जो सबसे [...]

बहुत याद आते हैं वो दिन

एक लड़की पर उसके प्रेमी ने तेजाब फेकां । कुछ महीनों बाद [...]

मैं बाट देखूंगा तेरी (मैं इंतजार करूँगा तेरा)

आज तो तू मज़बूरी का बहाना बना के चाल पड़ी, एक दिन खुद लौट के [...]

इन्टरनेट मुक्ति धाम

कई दिनों से खाली बैठा था, सोच रहा था कि कुछ नया काम करूँ [...]

मैं और मेरा भगवान

मैं उस भगवान को नहीं मानता जो किसी मंदिर या मजार में एक पत्थर [...]