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Author: siva sandeep garhwal

siva sandeep garhwal
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विधाएं

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एक मुसलसल ग़ज़ल

दर्द देते है वो नफासत से बाज़ आते नही हैं फितरत से तल्ख़ लहज़ा [...]

चांद का मेला

नभ ये उपवन सा सजेगा देखना कल रात मे, प्रेम रूपी गुल खिलेगा [...]

अमीरों की बनकर रही रौशनी है

अमीरों की बनकर रही रौशनी है, गरीबों के हिस्से मे बस तीरगी [...]

दोरे-हाजिर से डर रहा हूँ मैं,

दोरे-हाजिर, से डर रहा हूँ मै, रोज बेमौत मर रहा हूँ [...]